पहली बार रणथंभौर जा रहे हैं? टाइगर सफारी, सही समय और ट्रिप प्लान की पूरी जानकारी

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  अगर आप पहली बार रणथंभौर घूमने का प्लान बना रहे हैं, तो आपके मन में कई सवाल होंगे—रणथंभौर कब जाना चाहिए, कितने दिन रुकना सही रहेगा, टाइगर सफारी कैसे बुक करें, एक सफारी काफी है या दो करनी चाहिए और सबसे बड़ा सवाल, क्या रणथंभौर में बाघ जरूर दिखाई देता है? इन सवालों के जवाब जानना इसलिए जरूरी है क्योंकि रणथंभौर की यात्रा किसी सामान्य sightseeing trip जैसी नहीं है। यहां आपका अनुभव मौसम, सफारी के समय, जंगल की परिस्थितियों और थोड़े से भाग्य पर भी निर्भर करता है। मेरी नजर में रणथंभौर को सिर्फ “बाघ देखने की जगह” समझना सबसे बड़ी गलती होगी। सवाई माधोपुर के पास स्थित यह इलाका जंगल, झीलों, पहाड़ियों, वन्यजीवों और ऐतिहासिक रणथंभौर किले का ऐसा मेल है, जहां एक ही यात्रा में आपको प्रकृति और इतिहास दोनों को करीब से देखने का मौका मिलता है। अगर आप अपनी पहली यात्रा को थोड़ा सोच-समझकर प्लान करते हैं, तो सिर्फ एक सफारी के बजाय पूरा रणथंभौर अनुभव करना ज्यादा यादगार हो सकता है। पहली बार रणथंभौर जाने के लिए कितने दिन काफी हैं? अगर आप पहली बार रणथंभौर जा रहे हैं, तो 2 रात और 3 दिन का trip एक अच्छा विकल्...

मंडू : सन्नाटे में बसा मध्य प्रदेश का City of Joy

 

मध्य प्रदेश के धार ज़िले में बसा मंडू उन जगहों में से है जहाँ पहुँचते ही महसूस होता है कि यहाँ समय की रफ्तार धीमी है। न कोई भागदौड़, न शोर, न ही टूरिस्टों की  भीड़। चारों तरफ फैले पुराने किले, महल और मस्जिदें आज भी चुपचाप खड़ी हैं, जैसे किसी बीते दौर की कहानी सुनाने का इंतज़ार कर रही हों। शायद इसी वजह से मंडू को   कहा जाता है सिटी ऑफ़ जॉय, यहाँ की खुशी शोर में नहीं, सन्नाटे में छुपी है।

कभी मालवा सल्तनत की राजधानी रहा मंडू सत्ता, कला और प्रेम का केंद्र था। इसकी दीवारों ने राजाओं की चालें देखी हैं और इसकी हवाओं में आज भी प्रेम कहानियों की खुशबू घुली हुई है। बाज बहादुर और रानी रूपमती की प्रेम कथा मंडू की आत्मा में बसी हुई है। पहाड़ी पर स्थित रानी रूपमती का मंडप आज भी नर्मदा घाटी की ओर देखता है, जहाँ सूर्यास्त के समय आसमान और इतिहास दोनों एक साथ रंग बदलते हैं।

मंडू की इमारतें सिर्फ पत्थर नहीं हैं, वे अनुभव हैं। पानी के बीच बना जहाज़ महल ऐसा प्रतीत होता है जैसे आज भी तैर रहा हो। मानसून के दिनों में जब आसपास पानी भर जाता है, तब यह दृश्य और भी अलौकिक हो जाता है। हिंडोला महल की झुकी हुई दीवारें वास्तुकला की अनोखी मिसाल पेश करती हैं, वहीं विशाल जामी मस्जिद अपनी खामोशी से दिल को छू जाती है। यहाँ घूमते हुए कई बार ऐसा लगता है जैसे पूरा परिसर सिर्फ आपके लिए खुला हो।

बारिश के मौसम में मंडू का सौंदर्य अपने चरम पर होता है। चारों ओर हरियाली फैल जाती है, बादल किलों को छूते हुए गुजरते हैं और ठंडी हवा मन को हल्का कर देती है। झरने बहने लगते हैं और पत्थरों से टकराती बारिश इतिहास को जैसे फिर से जगा देती है। यही वह समय होता है जब मंडू सच में अपने नाम को सार्थक करता है।

आज भी मंडू भीड़ से इसलिए दूर है क्योंकि यहाँ दिखावे से ज़्यादा सादगी है। न बड़े मॉल हैं, न नाइटलाइफ का शोर। यहाँ लोग रुकने आते हैं, दौड़ने नहीं। साधारण होटल, हेरिटेज स्टेस  और स्थानीय भोजन इस जगह को और भी अपनापन देते हैं। कम बजट में यहाँ ऐसा अनुभव मिलता है जो मन में लंबे समय तक ठहर जाता है।

अगर आप उन यात्रियों में से हैं जो फोटो से ज़्यादा एहसास इकट्ठा करते हैं, जो भीड़ से दूर रहकर जगह को महसूस करना चाहते हैं, तो मंडू आपके लिए बना है। यह जगह आपको बुलाती नहीं, चुपचाप इंतज़ार करती है। और जो एक बार यहाँ की खामोशी को समझ लेता है, वह मंडू को कभी भूल नहीं पाता।

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