ज़ायके का संगम: वो शहर जहाँ की सुबह कढ़ी कचौड़ी की खुशबू से होती है गुलज़ार
पतंग उड़ाने की परंपरा भारत में सदियों पुरानी मानी जाती है। पहले के समय में राजा-महाराजा इसे मनोरंजन और कौशल प्रदर्शन के रूप में अपनाते थे, वहीं आज यह पर्व आमजन के जीवन का अभिन्न हिस्सा बन चुका है। छतों पर परिवार और मित्रों का एकत्र होना, ढोल-नगाड़ों की धुन, स्वादिष्ट पकवानों की खुशबू और आसमान में लहराती पतंगें इस उत्सव को खास बना देती हैं।
भारत के विभिन्न राज्यों में पतंग उत्सव को अलग-अलग नामों और तरीकों से मनाया जाता है। गुजरात में मकर संक्रांति के अवसर पर आयोजित अंतरराष्ट्रीय पतंग महोत्सव विश्वभर में प्रसिद्ध है। इस दौरान देश-विदेश से आए पतंगबाज अपनी कला का प्रदर्शन करते हैं और अहमदाबाद का आकाश रंगों से भर जाता है। राजस्थान, उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश में भी मकर संक्रांति पर पतंग उड़ाने की परंपरा बड़े उत्साह से निभाई जाती है।
दक्षिण भारत में यह पर्व पोंगल के रूप में मनाया जाता है, जहाँ पतंग उड़ाने के साथ-साथ प्रकृति और सूर्य देव को धन्यवाद दिया जाता है। पंजाब और हरियाणा में लोहड़ी के समय भी बच्चों और युवाओं में पतंग उड़ाने का जोश देखने को मिलता है। इस प्रकार पतंग उत्सव भारत की एकता में विविधता को दर्शाता है।
पतंग उत्सव का सामाजिक महत्व भी बहुत गहरा है। यह लोगों को आपसी मतभेद भूलकर एक साथ खुशियाँ मनाने का अवसर देता है। बच्चे, युवा और बुजुर्ग सभी इस उत्सव में समान रूप से भाग लेते हैं। यह पर्व हमें टीमवर्क, धैर्य और संतुलन का महत्व भी सिखाता है।
आज के समय में पतंग उत्सव के साथ पर्यावरण संरक्षण की भावना भी जुड़ रही है। लोग सुरक्षित और पर्यावरण के अनुकूल धागों का उपयोग करने लगे हैं, ताकि पक्षियों और प्रकृति को नुकसान न पहुँचे। यह सकारात्मक बदलाव इस परंपरा को और भी जिम्मेदार बनाता है।
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