अब ट्रेन और बस की यात्रा सिर्फ स्क्रीन तक सीमित क्यों हो गई?
कभी आप ट्रेन या बस में बैठें हैं, तो ध्यान दिया होगा कि आसपास बैठे लोग अक्सर अपने मोबाइल या हेडफोन में व्यस्त रहते हैं , और सामने वाले व्यक्ति को बस एक अपरिचित सिल्हूट की तरह देखते हैं। पहले की यात्राओं में लोग एक-दूसरे से बात करते थे, मुस्कुराते थे, कहानियाँ साझा करते थे। अब वही जगह चुप्पी और दूरियों की तरह बदल गई है। मोबाइल का जाल और दूरी मुझे याद है जब मैं कॉलेज के दिनों में ट्रेन यात्रा करता था, तो अनजान यात्रियों से बातचीत करना आम बात थी। कोई चाय लेकर बैठा होता, कोई अपने अनुभव साझा करता। लेकिन आज, मोबाइल और सोशल मीडिया की दुनिया में हम अपने आसपास के वास्तविक इंसानों को देखना ही भूल गए हैं। बस या ट्रेन में कई बार ऐसा होता है कि कोई मुस्कुराता है, या सीट शेयर करने में मदद करता है, लेकिन हम उस पहल को नोटिस नहीं करते। हमारी नजरें स्क्रीन पर होती हैं, और हमारे दिल कुशन की तरह आराम में , वास्तविक दुनिया से दूर। छोटे पल की यादें एक बार मुझे ट्रेन में एक दादी और उसका पोता मिले। पोता लगातार मोबाइल में गेम खेल रहा था, और दादी उदास बैठी थी। मैंने कोशिश की उन्हें बातचीत में जोड़...