गोण्ड पेंटिंग्स की कहानी: कैसे यह भारतीय लोककला बन गई ग्लोबल सेंसेशन
भारत की पारंपरिक कला और शिल्प की दुनिया में कई रूप लोकप्रिय हैं, लेकिन गोण्ड आदिवासी चित्रकला अपनी अलग पहचान रखती है। जब मैंने पहली बार गोण्ड पेंटिंग्स देखी, तो मुझे लगा कि ये सिर्फ कला नहीं, बल्कि प्रकृति और मानव सभ्यता के बीच की गहरी संबंध की कहानी कहती हैं।
शब्द ‘गोण्ड’ वास्तव में ‘कोंड’ से आया है, जिसका अर्थ है हरित पर्वत। इतिहासकार मानते हैं कि इस कला का जन्म लगभग 2000 साल पहले हुआ था। इसकी खासियत इसकी प्राकृतिक और सांस्कृतिक झलक को उज्ज्वल रंगों और जटिल डिज़ाइनों के माध्यम से दर्शाना है। गोण्ड आदिवासी कला के मामले में बेहद भाग्यशाली माने जाते हैं, क्योंकि ये अपनी कल्पना को अद्भुत चित्रों और शिल्प के रूप में व्यक्त कर पाते हैं।
जब मैंने जंगार सिंह श्याम के काम के बारे में पढ़ा, तो पता चला कि उन्होंने इस कला को विश्व स्तर पर पहचान दिलाई। पाटनगढ़ के रहने वाले जंगार सिंह श्याम की पेंटिंग्स 1980 के दशक तक राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय गैलरीज़ में प्रदर्शित की गईं। उनके शिष्य और पद्म श्री पुरस्कार से सम्मानित भज्जू श्याम ने भी इसी कला में अपने कदम बचपन में जंगार सिंह श्याम से सीखकर रखे।
गोण्ड पेंटिंग्स के थीम और प्रेरणा
गोण्ड चित्रकला पाटनगढ़, मध्य प्रदेश के प्रधान गोण्ड समुदाय की संस्कृति, परंपराओं, लोककथाओं और दैनिक जीवन का प्रतीक है। जंगल में रहने वाले इस समुदाय का जीवन प्रकृति से गहरा जुड़ा है, और यही जुड़ाव उनकी कला में स्पष्ट दिखाई देता है।
इन चित्रों में दुमर, बाबूल जैसे वृक्ष, और गाय, बकरी, बाघ, हाथी, मोर जैसे जीवों का चित्रण मिलता है। ये सिर्फ सजावट नहीं हैं, बल्कि समुदाय के लिए शुभ और पवित्र माने जाते हैं। प्रधान गोण्डों को कला का ध्वजवाहक माना जाता है।
सबसे रोचक बात यह है कि गोण्ड पेंटिंग्स में देवी-देवताओं को किसी विशिष्ट रूप में नहीं दिखाया जाता, बल्कि उन्हें पेड़ के नीचे पेंटेड पत्थर के रूप में प्रतिष्ठित किया जाता है। इन देवी-देवताओं का संबंध अक्सर प्राकृतिक तत्वों जैसे पेड़, सांप, कछुआ, पक्षियों और अन्य जीवों से होता है।
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