पहली बार रणथंभौर जा रहे हैं? टाइगर सफारी, सही समय और ट्रिप प्लान की पूरी जानकारी

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  अगर आप पहली बार रणथंभौर घूमने का प्लान बना रहे हैं, तो आपके मन में कई सवाल होंगे—रणथंभौर कब जाना चाहिए, कितने दिन रुकना सही रहेगा, टाइगर सफारी कैसे बुक करें, एक सफारी काफी है या दो करनी चाहिए और सबसे बड़ा सवाल, क्या रणथंभौर में बाघ जरूर दिखाई देता है? इन सवालों के जवाब जानना इसलिए जरूरी है क्योंकि रणथंभौर की यात्रा किसी सामान्य sightseeing trip जैसी नहीं है। यहां आपका अनुभव मौसम, सफारी के समय, जंगल की परिस्थितियों और थोड़े से भाग्य पर भी निर्भर करता है। मेरी नजर में रणथंभौर को सिर्फ “बाघ देखने की जगह” समझना सबसे बड़ी गलती होगी। सवाई माधोपुर के पास स्थित यह इलाका जंगल, झीलों, पहाड़ियों, वन्यजीवों और ऐतिहासिक रणथंभौर किले का ऐसा मेल है, जहां एक ही यात्रा में आपको प्रकृति और इतिहास दोनों को करीब से देखने का मौका मिलता है। अगर आप अपनी पहली यात्रा को थोड़ा सोच-समझकर प्लान करते हैं, तो सिर्फ एक सफारी के बजाय पूरा रणथंभौर अनुभव करना ज्यादा यादगार हो सकता है। पहली बार रणथंभौर जाने के लिए कितने दिन काफी हैं? अगर आप पहली बार रणथंभौर जा रहे हैं, तो 2 रात और 3 दिन का trip एक अच्छा विकल्...

कुर्ता, पायजामा, सलवार, कुर्ती भारत का पारंपरिक पोशाक


 भारतीय सनातन संस्कृति का विशेष वस्त्र है कुर्ता एवं पजामा (पायजामा)। यह प्रत्येक प्रांत में अलग-अलग शैली में पहना जाता है। कुर्ते को अफगानिस्तान में पैरहन, कश्मीर में फिरान और नेपाल में दौरा के नाम से जाना जाता है। राजस्थानी, भोपाली, लखनवी, मुल्तानी, पठानी, पंजाबी, बंगाली, हर कुर्ते की डिजाइन अलग होती है।जिस तरह पुरुष कुर्ता और पायजामा पहनते हैं उसी तरह महिलाएं कुर्ती और पायजामे (सलवार) के साथ चुनरी, ओढ़नी या दुपट्टा भी पहनती हैं। यह महिलाओं के लिए अलग शैली में निर्मित होता है। पंजाबी शैली, उत्तर भारतीय शैली (स्टाइल) आदि में निर्मित सलवार-कुर्ती महिलाओं के लिए सबसे उत्तम वस्त्र माना गया है।

 
जम्मू और कश्मीर में ठंड अधिक होने के कारण वहां की महिलाएं व पुरुष 'पैरहन' पहनते हैं। यह पोशाक पहाड़ी इलाकों में काफी प्रसिद्ध है। कश्मीर की महिलाएं सिर को दुपट्टे से ढंककर पीछे से बांध लेती हैं। हालांकि वर्तमान में कट्टरपंथ के चलते वहां कश्मीरियत को छोड़कर अरबी संस्कृति के पहनावे पर जोर दिया जा रहा है। 'सलवार' नामक चौड़े पायजामे से पैर ढंका रहता था जबकि ऊपरी हिस्से में पूरे बांह की कमीज पहनी जाती थी। इसके ऊपर एक छोटा अंगरखा कोट होता था जिसे सदरी कहते थे। बाहरी लबादे को चोगा कहते थे, जो नीचे टखनों तक आता था। इसकी एक लंबी, ढीली आस्तीन होती थी और एक कमरबंद होता था। सर की पोशाक एक छोटे कपड़े से ढंकी छोटी चुस्त टोपी से बनी होती थी। इसी से पगड़ी बनती थी। 
 
कुर्ता और पायजामा पहनने से शरीर के चारों ओर दीर्घ वृत्ताकार (दीप की ज्योति समान) कवच निर्मित होता है। इसे पहनने से व्यक्ति आरामदायक अनुभव (कंफर्ट फिल) करता है। सेहत, शांति और मन की प्रसन्नता के लिए यह सबसे उत्तम वस्त्र है। कुर्ते सूती, ऊनी और रेशमी सभी तरह के सामग्रियों में मिलते हैं। कुर्ते के कई परिवर्धित रूप हैं जिनमें शेरवानी, पठानी सूट इत्यादि प्रचलित हैं।

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