भारतीय लोग ज्योतिष में क्यों विश्वास करते हैं
दशाश्वमेध घाट पर आरती की तैयारी शुरू होते ही वातावरण में एक पवित्र कंपन फैल जाता है। शंखनाद, मंत्रोच्चार और घंटे की ध्वनि हवा में घुलकर मन को भीतर तक छू लेती है। दीपों की पंक्तियाँ जब एक साथ प्रज्ज्वलित होती हैं, तो गंगा का जल सितारों की तरह चमक उठता है। हर दीप जैसे किसी श्रद्धालु की प्रार्थना बनकर माँ गंगा की गोद में उतरता है।
काशी की गंगा आरती केवल देखने का दृश्य नहीं है, यह महसूस करने की साधना है। पुजारियों की लयबद्ध मुद्राएँ, अग्नि की ऊँचाई, और मंत्रों की गूंज—सब मिलकर एक ऐसा आध्यात्मिक संगम रचते हैं, जहाँ मन की बेचैनी अपने आप शांत हो जाती है। यहाँ श्रद्धा किसी धर्म की सीमा में नहीं बँधती; देश-विदेश से आए लोग एक साथ उसी शांति को महसूस करते हैं।
जब आरती के बाद दीपदान के लिए छोटी-छोटी डोंगियाँ गंगा में छोड़ी जाती हैं, तो ऐसा लगता है जैसे पूरी नदी सपनों और विश्वासों से भर गई हो। उस पल काशी सिर्फ़ देखने की जगह नहीं रहती, बल्कि भीतर उतर जाने वाला अनुभव बन जाती है। शायद इसी कारण कहा जाता है कि काशी में गंगा नहीं बहती, बल्कि मोक्ष की धारा प्रवाहित होती है।
मेरी बोलती कलम के लिए गंगा आरती सिर्फ़ एक विषय नहीं, बल्कि भावनाओं का प्रवाह है। बनारस की यह संध्या हमें याद दिलाती है कि आधुनिक शोरगुल के बीच भी शांति आज भी जीवित है—बस उसे महसूस करने के लिए एक बार गंगा के किनारे बैठना होता है।
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