gents और लेडीज़ जींस फैशन की पूरी कहानी जब नीले डेनिम ने बदली भारत की सोच:
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भारत में जींस पैंट का फैशन अचानक नहीं आया, बल्कि ये धीरे-धीरे लोगों की ज़िंदगी और सोच का हिस्सा बनता चला गया। आज जो जींस हमें रोज़मर्रा की ड्रेस लगती है, कभी वो मॉडर्न सोच, आज़ादी और वेस्टर्न कल्चर की पहचान मानी जाती थी। भारत में जींस का असली आग़ाज़ 1970 के दशक के आसपास माना जाता है, जब बड़े शहरों में रहने वाले युवा विदेशी फिल्मों, म्यूज़िक और लाइफस्टाइल से प्रभावित होने लगे। उस दौर में जींस पहनना सिर्फ़ कपड़े का चुनाव नहीं था, बल्कि ये बताता था कि पहनने वाला नई सोच और नए ज़माने से जुड़ा है।
शुरुआत में जींस खास तौर पर कॉलेज स्टूडेंट्स और मिडिल-क्लास युवाओं में लोकप्रिय हुई। उस समय ये आसानी से हर जगह नहीं मिलती थी और काफ़ी महंगी भी मानी जाती थी। ज़्यादातर जींस या तो विदेश से मंगाई जाती थी या फिर लोकल टेलर्स के ज़रिए मोटे डेनिम कपड़े से सिली जाती थी। 1980 के दशक तक आते-आते भारतीय बाज़ार में धीरे-धीरे देसी ब्रांड्स और मिल्स ने डेनिम बनाना शुरू किया, जिससे जींस आम लोगों की पहुँच में आने लगी।
महिलाओं के लिए जींस का सफ़र थोड़ा अलग और चुनौतीपूर्ण रहा। पहले इसे लड़कों का कपड़ा माना जाता था, लेकिन जैसे-जैसे महिलाओं की शिक्षा, कामकाजी भूमिका और आत्मनिर्भरता बढ़ी, वैसे-वैसे जींस भी उनके वॉर्डरोब का हिस्सा बनती चली गई। 1990 के दशक में जब भारत में आर्थिक उदारीकरण हुआ, तब विदेशी ब्रांड्स, फैशन मैगज़ीन और टीवी चैनलों ने जींस को हर उम्र और जेंडर के लिए ट्रेंडी बना दिया।
आज भारत में जींस सिर्फ़ फैशन नहीं, बल्कि कम्फर्ट, स्टाइल और पहचान का कॉम्बिनेशन बन चुकी है। गांव से लेकर शहर तक, स्कूल से लेकर ऑफिस तक, जींस हर जगह अपनी मौजूदगी दर्ज करा चुकी है। गेंट्स हो या लेडीज़, जींस ने भारतीय फैशन में वो जगह बना ली है, जहाँ से इसका जाना अब मुश्किल ही नहीं, नामुमकिन लगता है।
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