हैदराबाद: तहजीब, जायके और तकनीक का एक अनूठा संगम
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भारत के दक्षिणी हिस्से में स्थित हैदराबाद मात्र एक शहर नहीं, बल्कि सदियों पुरानी परंपराओं और भविष्य की आधुनिकता का एक जीवंत कोलाज है। मूसी नदी के तट पर बसा यह नगर अपनी 'गंगा-जामुनी तहजीब' के लिए पूरी दुनिया में एक मिसाल पेश करता है। जब हम हैदराबाद की गलियों में कदम रखते हैं, तो ऐसा लगता है जैसे इतिहास खुद हमसे बातें कर रहा हो। कुतुब शाही सुल्तान मुहम्मद कुली कुतुब शाह द्वारा 1591 में स्थापित यह शहर आज भी अपनी जड़ों से जुड़ा हुआ है और साथ ही साथ 'साइबराबाद' के रूप में अपनी नई पहचान बना चुका है।
शहर का हृदय माना जाने वाला चारमीनार अपनी चार भव्य मीनारों के साथ आज भी उस भव्यता की गवाही देता है, जिसने कभी निजामों के दौर में इस शहर को 'मोतियों का शहर' (City of Pearls) बनाया था। इसके पास ही स्थित लाड बाजार की चूड़ियों की खनक और इत्र की खुशबू सैलानियों को एक अलग ही दुनिया में ले जाती है। यहाँ की वास्तुकला में फारसी और भारतीय शैलियों का जो मिश्रण देखने को मिलता है, वह गोलकुंडा किले की दीवारों से लेकर फलकनुमा पैलेस की नक्काशी तक साफ झलकता है। गोलकुंडा किला न केवल सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण रहा है, बल्कि इसकी ध्वनि इंजीनियरिंग आज भी आधुनिक वास्तुकारों को हैरान कर देती है।
लेकिन हैदराबाद का सफर इसके जायकों के बिना अधूरा है। हैदराबादी बिरयानी, जिसका नाम सुनते ही मुंह में पानी आ जाता है, यहाँ की पहचान है। धीमी आंच पर पकने वाली इस बिरयानी का स्वाद यहाँ के मसालों और निजामी रसोइयों की विरासत है। इसके अलावा, ईरानी चाय और उस्मानी बिस्कुट की जोड़ी यहाँ की शामों को खुशनुमा बना देती है। रमजान के महीने में मिलने वाली हलीम का स्वाद तो पूरी दुनिया में मशहूर है। यह शहर जितना अपनी ऐतिहासिक इमारतों के लिए जाना जाता है, उतना ही यहाँ के लोगों की मेहमाननवाजी और उनकी खास 'हैदराबादी बोली' के लिए भी पसंद किया जाता है, जिसमें प्यार और अपनापन घुला होता है।
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