क्या भारतीय राजनीति को धर्म और जातिवाद से दूर रखा जा सकता है
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धर्म और राजनीति: एक अभिन्न संबंध
भारत में राजनीति और समाज की जड़ें बहुत गहरे हैं, और इन जड़ों में विभिन्न समाजिक तत्वों का प्रभाव रहा है। हालांकि, यह जरूरी नहीं है कि राजनीति में धर्म या जाति का भूमिका हमेशा विवादित ही हो। भारतीय लोकतंत्र में यह आदर्श है कि राजनीति का उद्देश्य समाज के प्रत्येक वर्ग को समान अधिकार, अवसर और सम्मान देना हो, चाहे उनका पृष्ठभूमि या पहचान कुछ भी हो।
धर्म और जातिवाद से राजनीति को प्रभावित करने का मुख्य कारण यह है कि ये समाज में गहरे रूप से जड़े हुए हैं। हालांकि, अगर हम इस परिपाटी को छोड़ दें और राजनीति को एक ऐसे मंच के रूप में देखें जहां हर व्यक्ति की आवाज सुनी जाए, तो हम एक ऐसा लोकतंत्र बना सकते हैं जो केवल विकास और सामाजिक कल्याण पर ध्यान केंद्रित करे।
राजनीति में जातिवाद और धर्म का स्थान
यदि हम राजनीति की गहरी बात करें, तो यह समझना जरूरी है कि भारतीय राजनीति का उद्देश्य केवल सत्ता तक पहुंचना नहीं होना चाहिए। बल्कि इसका मूल उद्देश्य देश की सामाजिक और आर्थिक स्थिति में सुधार लाना और लोगों को एक समान अवसर देना होना चाहिए। समाज में विभिन्न समूहों के बीच समानता और समृद्धि के लिए विकासात्मक कदम उठाने का कार्य राजनीति का मुख्य हिस्सा होना चाहिए।
इसका मतलब यह नहीं कि समाज के विभिन्न पहलुओं को नज़रअंदाज किया जाए, बल्कि यह कहा जा सकता है कि यदि हम राजनीति को सामाजिक और विकासात्मक मुद्दों के आसपास केंद्रित करें, तो हम धर्म और जाति के प्रभाव को कम कर सकते हैं।
क्या यह संभव है
यह सवाल गंभीर है, और इसका उत्तर निश्चित रूप से चुनौतीपूर्ण हो सकता है। भारतीय राजनीति को धर्म और जातिवाद से अलग करना कई तरह से कठिन हो सकता है, क्योंकि ये मुद्दे समाज में गहरे तक जुड़े हुए हैं। लेकिन, यह असंभव नहीं है।
हमारे समाज में पहले से ही बहुत सी ऐसे पहलू हैं जो हमें एकजुट करते हैं, जैसे कि एक समान संविधान, समान नागरिक अधिकार, और सबसे बढ़कर भारतीय संस्कृति की बुनियाद—जो विविधता में एकता का संदेश देती है। अगर हम इन पहलुओं पर अधिक ध्यान केंद्रित करें, तो हम राजनीति में धर्म और जातिवाद को प्राथमिकता देने के बजाय, विकास, शिक्षा, स्वास्थ्य और समान अधिकार जैसे मुद्दों को प्रमुख बना सकते हैं।

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