गोंधल क्या है? मराठी परंपरा से ऑस्कर तक

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  Gondhal Oscar 2027: मराठी फिल्म ‘गोंधल’ के भारत की आधिकारिक ऑस्कर एंट्री बनने के बाद महाराष्ट्र की एक पारंपरिक लोक-विधि भी चर्चा में आ गई है। आखिर गोंधल क्या है और इस परंपरा का फिल्म से क्या संबंध है? आइए समझते हैं। गोंधल आखिर होता क्या है? महाराष्ट्र में गोंधल एक पारंपरिक धार्मिक अनुष्ठान और लोक-प्रस्तुति है, जिसमें भक्ति, संगीत, गायन और नृत्य का मेल देखने को मिलता है। यह परंपरा कुछ परिवारों में कुलदेवता की पूजा और शुभ अवसरों से जुड़ी रही है। महाराष्ट्र के मराठी विश्वकोश के अनुसार, गोंधल देवी की स्तुति और पूजा से जुड़ा एक कुलाचार है। गोंधल की प्रस्तुति करने वाले कलाकारों को गोंधली कहा जाता है। पारंपरिक प्रस्तुति में देवी-देवताओं की स्तुति, लोकगीत, वाद्य संगीत और नृत्य शामिल होते हैं। शादी जैसे शुभ अवसरों पर भी होती है यह परंपरा गोंधल का संबंध महाराष्ट्र के कुछ परिवारों में विवाह और दूसरे मंगल अवसरों से रहा है। महाराष्ट्र सरकार के गजेटियर में भी इसका उल्लेख मिलता है कि शुभ अवसर के बाद देवी की पूजा और स्तुति के लिए गोंधल की प्रस्तुति की जाती थी। इस दौरान रात में संगीत और नृत्य ...

एक अनजान स्टेशन पर उतरी सुबह — एक यात्रा जिसने बहुत कुछ सिखाया

रात की ट्रेन दिल्ली से शिमला की ओर जा रही थी। डिब्बे में नींद और खामोशी का अजीब-सा संगम था। मैंने खिड़की से झाँका — बाहर के तारों भरे आसमान के नीचे, रेल की पटरी ऐसे मुड़ रही थी जैसे कोई पुरानी कहानी धीरे-धीरे खुल रही हो।

रात के करीब 3 बजे ट्रेन अचानक रुक गई। स्टेशन का नाम धुँध में छिपा था — “कुमारहट्टी”। न कोई अनाउंसमेंट, न भीड़। बस दो-तीन झपकती पीली लाइटें और ठंडी हवा में उड़ता कोहरा। मैं नीचे उतर आया, बिना किसी वजह के। बस एक अनजाने खिंचाव से।

प्लेटफ़ॉर्म के एक कोने में एक चायवाला था — लकड़ी की जलती हुई आग पर केतली रखे हुए। उसने मुस्कुराकर कहा —

“साहब, इतनी रात में उतर गए? यहाँ तो ज़्यादा कोई रुकता नहीं।”

मैंने हँसते हुए कहा —

“शायद रुकने का मन नहीं था, ठहरने का था।”

उसने जो चाय दी, वो किसी पाँच-सितारा कॉफ़ी से कहीं ज़्यादा सच्ची थी। आसमान में कोहरे के बीच से धीरे-धीरे भोर का रंग उतरने लगा। पहाड़ों की आकृतियाँ धुंध से उभर रहीं थीं, और पटरियों के किनारे खिलते जंगली फूल जैसे किसी ने जानबूझकर वहाँ रख दिए हों।

उस एक घंटे में मैंने महसूस किया —

“कभी-कभी मंज़िल से ज़्यादा मायने रखता है वो मोड़, जहाँ आप रुककर खुद से मिलते हैं।”

सुबह की पहली ट्रेन आई, और मैं वापस उसी में चढ़ गया। कुमारहट्टी स्टेशन पीछे छूट गया, लेकिन उसका सन्नाटा, वो चाय की महक, और वो एक घंटे की शांति — शायद हमेशा मेरे साथ रह गई।

अगर आप कभी जाएँ —
कुमारहट्टी (हिमाचल प्रदेश) शिमला जाते समय सोलन के पास एक छोटा स्टेशन है।
सुबह का समय सबसे सुंदर होता है — कोहरा, पहाड़, और सन्नाटा एक साथ।
और हाँ, वहाँ की चाय ज़रूर पीना।

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