ज़ायके का संगम: वो शहर जहाँ की सुबह कढ़ी कचौड़ी की खुशबू से होती है गुलज़ार

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  भारतीय खान-पान की दुनिया में कचौड़ी का नाम आते ही मन में एक करारा और तीखा स्वाद घुल जाता है, लेकिन जब इसी खस्ता कचौड़ी के ऊपर गरमा-गरम चटपटी कढ़ी डाली जाती है, तो वह स्वाद एक नया ही अनुभव बन जाता है। भारत के कई शहरों में कढ़ी-कचौड़ी केवल एक नाश्ता नहीं बल्कि वहाँ की जीवनशैली और संस्कृति का अहम हिस्सा है। राजस्थान का ajmer    शहर इस मामले में सबसे आगे है, जहाँ के केसरगंज और गोल प्याऊ जैसे इलाकों में सुबह होते ही कढ़ी-कचौड़ी की खुशबू हर गली में महकने लगती है। यहाँ की खास बात यह है कि दाल की कचौड़ी को मथकर उसके ऊपर बेसन की पतली और मसालेदार कढ़ी डाली जाती है, जो सेलिब्रिटीज से लेकर आम आदमी तक सबको दीवाना बना देती है। राजस्थान का ही एक और ज़िला bhartpur  अपनी छोटी कचौड़ियों के लिए 'सिटी ऑफ कचौड़ी' के नाम से विख्यात है। यहाँ कढ़ी के साथ छोटी-छोटी कुरकुरी कचौड़ियाँ परोसी जाती हैं, जो बाहरी पर्यटकों के लिए भी एक बड़ा आकर्षण हैं। इसके अलावाjalor  में दही और कढ़ी के साथ कचौड़ी का कॉम्बो काफी लोकप्रिय है। मध्य प्रदेश केindore  औरjallor जैसे शहरों में ...

राम बाग Agra भारत का सबसे पुराना मुगल उद्यान और इतिहास की एक अनकही कहानी

 


आज राम बाग के नाम से जानते हैं। सन् १५२८ में मुगल साम्राज्य के संस्थापक बाबर ने इस उद्यान का निर्माण करवाया था और उस समय इसे आराम बाग या बाग-ए-गुल-अफशां के नाम से पुकारा जाता था। बाबर को उद्यानों से बेहद प्रेम था और उन्होंने काबुल की यादों को ताज़ा करने के लिए यमुना के किनारे इस खूबसूरत बाग की नींव रखी थी। इस बाग की बनावट में पर्शियन चारबाग शैली का प्रभाव साफ नजर आता है जहाँ बहता हुआ पानी और ज्यामितीय आकार एक स्वर्ग जैसा अहसास कराते हैं।

इतिहास के पन्नों में इस स्थान का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि सन् १५३० में बाबर की मृत्यु के बाद उनके पार्थिव शरीर को अस्थायी रूप से इसी बाग में रखा गया था जिसके बाद उन्हें काबुल ले जाया गया। समय के साथ इस उद्यान के नाम और स्वरूप में कई बदलाव आए। मुगल बादशाह जहाँगीर के शासनकाल में उनकी पत्नी नूरजहाँ ने इस बाग का पुनरुद्धार करवाया और इसे अपनी पसंद के अनुसार सजाया। कहा जाता है कि जहाँगीर और नूरजहाँ को यह स्थान इतना प्रिय था कि वे यहाँ अक्सर समय बिताया करते थे। मराठा शासनकाल के दौरान जब १७७५ से १८०३ के बीच आगरा उनके अधीन रहा तब इस स्थान का नाम बदलकर राम बाग कर दिया गया जो आज भी प्रचलित है।
 की वास्तुकला में तीन स्तरों का उपयोग किया गया है जिसमें फूलों और वनस्पतियों के साथ-साथ शानदार चबूतरे और जल प्रपात बनाए गए हैं। यमुना से पानी निकालकर उसे नहरों और हौज के माध्यम से पूरे बाग में पहुँचाया जाता था जो यहाँ के वातावरण को भीषण गर्मी में भी ठंडा बनाए रखता था। आज यह उद्यान भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के संरक्षण में है और आगरा आने वाले पर्यटकों के लिए एक शांत और सुकून भरा अनुभव प्रदान करता है। ताजमहल की चमक-धमक से दूर यह बाग मुगल काल की सादगी और प्राकृतिक प्रेम का एक अनूठा उदाहरण है।

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