ज़ायके का संगम: वो शहर जहाँ की सुबह कढ़ी कचौड़ी की खुशबू से होती है गुलज़ार

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  भारतीय खान-पान की दुनिया में कचौड़ी का नाम आते ही मन में एक करारा और तीखा स्वाद घुल जाता है, लेकिन जब इसी खस्ता कचौड़ी के ऊपर गरमा-गरम चटपटी कढ़ी डाली जाती है, तो वह स्वाद एक नया ही अनुभव बन जाता है। भारत के कई शहरों में कढ़ी-कचौड़ी केवल एक नाश्ता नहीं बल्कि वहाँ की जीवनशैली और संस्कृति का अहम हिस्सा है। राजस्थान का ajmer    शहर इस मामले में सबसे आगे है, जहाँ के केसरगंज और गोल प्याऊ जैसे इलाकों में सुबह होते ही कढ़ी-कचौड़ी की खुशबू हर गली में महकने लगती है। यहाँ की खास बात यह है कि दाल की कचौड़ी को मथकर उसके ऊपर बेसन की पतली और मसालेदार कढ़ी डाली जाती है, जो सेलिब्रिटीज से लेकर आम आदमी तक सबको दीवाना बना देती है। राजस्थान का ही एक और ज़िला bhartpur  अपनी छोटी कचौड़ियों के लिए 'सिटी ऑफ कचौड़ी' के नाम से विख्यात है। यहाँ कढ़ी के साथ छोटी-छोटी कुरकुरी कचौड़ियाँ परोसी जाती हैं, जो बाहरी पर्यटकों के लिए भी एक बड़ा आकर्षण हैं। इसके अलावाjalor  में दही और कढ़ी के साथ कचौड़ी का कॉम्बो काफी लोकप्रिय है। मध्य प्रदेश केindore  औरjallor जैसे शहरों में ...

भारत की आखिरी सड़कें : जहाँ से आगे सिर्फ पहाड़, जंगल और आकाश

 

यह कोई कल्पना नहीं, बल्कि भारत की हकीकत है। देश के कुछ कोनों में आज भी ऐसी सड़कें मौजूद हैं जहाँ जाकर एहसास होता है कि इंसानी सभ्यता यहीं तक आई है और इसके आगे सिर्फ़ पहाड़, जंगल और खुला आकाश बचता है। ये सड़कें सिर्फ़ रास्ते नहीं हैं, बल्कि भारत के सीमांत जीवन की असली कहानियाँ हैं। लद्दाख की हनले रोड ऐसी ही एक सड़क है। यहाँ से आगे चीन सीमा शुरू हो जाती है। पतली, ऊबड़-खाबड़ सड़क के दोनों ओर फैला सन्नाटा इतना गहरा होता है कि हवा की आवाज़ तक साफ़ सुनाई देती है। मोबाइल नेटवर्क नहीं, दुकानों की कतार नहीं बस दूर-दूर तक फैली बर्फीली पहाड़ियाँ और नीला आसमान।

अरुणाचल प्रदेश की किबिथू सड़क भारत की पूर्वी आख़िरी सड़कों में गिनी जाती है। यह वही इलाका है जहाँ सूरज सबसे पहले उगता है। यहाँ सड़क खत्म होते ही घना जंगल शुरू हो जाता है, और उसके बाद म्यांमार की सीमा। स्थानीय लोग आज भी सीमित संसाधनों के बीच सादा जीवन जीते हैं।उत्तराखंड की माणा और नीलापानी सड़कें भी इसी सूची में आती हैं। बद्रीनाथ से आगे माणा गांव तक बनी सड़क भारत की आख़िरी सड़कों में से एक है। इसके आगे केवल बर्फ़, चट्टानें और प्राचीन पगडंडियाँ हैं, जिन पर कभी व्यापारी और तीर्थयात्री चला करते थे।

इन सड़कों की खास बात यह है कि यहाँ सफर मंज़िल से ज़्यादा महत्वपूर्ण हो जाता है। न कोई भीड़, न ट्रैफिक का शोर—सिर्फ़ प्रकृति और आप। यहाँ के लोग सेना के जवानों और सीमित यात्रियों पर ही निर्भर रहते हैं, और जीवन आज भी मौसम के हिसाब से चलता है।

हाल के वर्षों में सरकार ने सीमांत क्षेत्रों में सड़क संपर्क बेहतर करने की कोशिश की है, ताकि सुरक्षा और स्थानीय जीवन दोनों को मजबूती मिल सके। लेकिन इन “आख़िरी सड़कों” का असली आकर्षण आज भी उनकी खामोशी और सादगी में छिपा है।

भारत की ये आख़िरी सड़कें हमें याद दिलाती हैं कि विकास के साथ-साथ देश का एक हिस्सा आज भी प्रकृति के सबसे करीब सांस ले रहा हैजहाँ सड़क खत्म होती है, और भारत की सबसे गहरी कहानियाँ शुरू होती हैं।

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