ओणम — केरल का प्रमुख त्योहार
भारत तेजी से आधुनिक बन रहा है। स्मार्ट सिटी, एक्सप्रेसवे, डिजिटल इंडिया और स्वच्छता अभियानों के बीच एक सवाल आज भी बार-बार उठता है—आखिर भारत में कई पुरुष सार्वजनिक स्थानों पर खुले में पेशाब क्यों करते हैं? क्या यह हमारी संस्कृति का हिस्सा है, या सिर्फ एक बुरी आदत जो समय के साथ सामान्य बन गई?
इस प्रश्न का उत्तर "हाँ" या "नहीं" में नहीं दिया जा सकता। इसके पीछे इतिहास, सामाजिक सोच, बुनियादी सुविधाओं की कमी, कानून का कमजोर पालन और व्यक्तिगत व्यवहार—सभी की भूमिका है।
सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि भारतीय संस्कृति में कहीं भी खुले में पेशाब करने को आदर्श या धार्मिक परंपरा नहीं माना गया है।
प्राचीन भारतीय ग्रंथों में स्वच्छता, शौच और जल स्रोतों की पवित्रता पर विशेष जोर दिया गया है। कई धार्मिक नियमों में साफ लिखा गया है कि सार्वजनिक स्थानों, रास्तों और जलाशयों को गंदा नहीं करना चाहिए।
Read Also पुराने सिनेमाघर : बदलता समय और खोती यादें
असल समस्या संस्कृति नहीं, बल्कि समय के साथ विकसित हुई सामाजिक आदतें हैं।
भारत की बड़ी आबादी ऐसे समय में बढ़ी जब शहरों और कस्बों में पर्याप्त सार्वजनिक शौचालय मौजूद नहीं थे।
जब किसी व्यक्ति को कई किलोमीटर तक शौचालय नहीं मिलता, तो वह आसान विकल्प चुन लेता है। यही व्यवहार धीरे-धीरे सामान्य बन गया।
जब कोई व्यवहार वर्षों तक बिना रोक-टोक चलता रहता है, तो अगली पीढ़ी उसे असामान्य नहीं मानती।
समाज में अक्सर पुरुषों के खुले में पेशाब करने को सामान्य माना गया, जबकि महिलाओं के लिए यह सामाजिक रूप से स्वीकार्य नहीं था।
यही कारण है कि सड़क किनारे पेशाब करते पुरुष अक्सर लोगों की नजर में "गलत" नहीं बल्कि "सामान्य" दिखाई देते हैं।
यानी यह केवल सुविधा का नहीं बल्कि सामाजिक स्वीकृति का भी मामला है।
कई नगर निगम सार्वजनिक स्थानों पर पेशाब करने पर जुर्माना लगाते हैं।
लेकिन वास्तविकता यह है कि अधिकांश जगहों पर नियमों का पालन नियमित रूप से नहीं कराया जाता।
जब दंड का डर कम होता है, तो गलत व्यवहार लंबे समय तक जारी रहता है।
व्यवहार विज्ञान के अनुसार इंसान वही काम जल्दी अपनाता है जो वह दूसरों को करते हुए देखता है।
यदि किसी सड़क पर पहले से कई लोग दीवार के किनारे पेशाब करते दिखते हैं, तो नए लोग भी वही करने लगते हैं।
धीरे-धीरे यह एक सामाजिक पैटर्न बन जाता है।
भारत में अभी भी कुछ लोग मानते हैं कि सड़क या सार्वजनिक स्थान की सफाई केवल सरकार का काम है।
जब तक नागरिक खुद सार्वजनिक स्थानों को अपनी जिम्मेदारी नहीं मानेंगे, तब तक केवल सफाई अभियान स्थायी बदलाव नहीं ला पाएंगे।
यह भी एक गलत धारणा है।
खुले में पेशाब करने वाले लोगों में केवल गरीब या मजदूर ही शामिल नहीं होते।
कई बार अच्छी आय वाले, शिक्षित और निजी वाहन चलाने वाले लोग भी सार्वजनिक स्थानों पर ऐसा करते दिखाई देते हैं।
इससे स्पष्ट होता है कि यह केवल आर्थिक समस्या नहीं बल्कि व्यवहार और नागरिक अनुशासन की समस्या भी है।
दुनिया के कई विकसित देशों में पर्याप्त सार्वजनिक शौचालय उपलब्ध होते हैं।
नियमों का सख्ती से पालन कराया जाता है।
लोग सार्वजनिक स्वच्छता को व्यक्तिगत जिम्मेदारी मानते हैं।
इसका अर्थ यह नहीं कि वहां कोई भी ऐसा नहीं करता, बल्कि ऐसे मामलों की संख्या अपेक्षाकृत कम होती है।
नहीं।
अगर केवल शौचालय बनाना ही पर्याप्त होता, तो समस्या अब तक काफी हद तक समाप्त हो चुकी होती।
स्थायी समाधान के लिए पर्याप्त और साफ सार्वजनिक शौचालय, व्यवहार परिवर्तन और नागरिक शिक्षा, तथा नियमों का निष्पक्ष पालन—तीनों आवश्यक हैं।
इन तीनों के बिना केवल निर्माण कार्य समस्या का पूरा समाधान नहीं कर सकता।
कई लोग सोचते हैं कि "बस दो मिनट की बात है।"
यही सोच धीरे-धीरे पूरे शहर की स्वच्छता को प्रभावित करती है।
जब एक व्यक्ति सार्वजनिक स्थान को गंदा करता है, तो दूसरे लोग भी वही व्यवहार दोहराने लगते हैं।
इसीलिए स्वच्छता केवल सफाई कर्मचारियों की नहीं, बल्कि हर नागरिक की जिम्मेदारी है।
पिछले कुछ वर्षों में सकारात्मक बदलाव भी दिखाई दिए हैं।
स्कूलों में स्वच्छता शिक्षा बढ़ी है।
शहरों में सार्वजनिक शौचालयों की संख्या बढ़ रही है।
डिजिटल मैप्स पर टॉयलेट लोकेशन उपलब्ध होने लगी हैं।
युवा पीढ़ी सार्वजनिक स्वच्छता को पहले की तुलना में अधिक गंभीरता से लेने लगी है।
हालांकि अभी भी लंबा रास्ता तय करना बाकी है।
भारतीय लोगों का सार्वजनिक स्थानों पर पेशाब करना भारतीय संस्कृति नहीं है, बल्कि कई दशकों से चली आ रही सामाजिक आदत, अपर्याप्त सुविधाओं, कमजोर कानून-पालन और नागरिक व्यवहार का संयुक्त परिणाम है।
इस समस्या का समाधान केवल सरकार या केवल जनता अकेले नहीं कर सकती। जब पर्याप्त सुविधाएं, प्रभावी कानून और जिम्मेदार नागरिक व्यवहार एक साथ आएंगे, तभी वास्तविक बदलाव दिखाई देगा।
स्वच्छ भारत केवल अभियान नहीं, बल्कि रोजमर्रा की व्यक्तिगत आदतों से बनने वाली सामाजिक संस्कृति है।
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें