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हनु-मैन इतनी सफल क्यों हुई? फिल्म ने दर्शकों को सिर्फ कहानी नहीं, एक अनुभव दिया

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  कुछ फिल्में सिनेमाघर में देखी जाती हैं और फिर कुछ दिनों बाद उनकी चर्चा खत्म हो जाती है। लेकिन कुछ फिल्में दर्शकों के बीच अपनी एक अलग जगह बना लेती हैं। लोग उनके दृश्य याद रखते हैं, दोस्तों से उनके बारे में बात करते हैं और सोशल मीडिया पर उनसे जुड़े पल साझा करते हैं। ‘हनु-मैन’ की लोकप्रियता को समझने के लिए सिर्फ यह कहना पर्याप्त नहीं है कि फिल्म में सुपरहीरो था या इसमें पौराणिक तत्व थे। असली दिलचस्पी इस बात में है कि फिल्म ने दर्शकों के साथ किस तरह का रिश्ता बनाया। तेजा सज्जा की यह फिल्म एक ऐसे समय में सामने आई जब दर्शक बड़े पर्दे पर भारतीय कहानियों को नए अंदाज में देखने में रुचि दिखा रहे थे। हनु-मैन ने इसी रुचि को एक छोटे शहर और ग्रामीण परिवेश की कहानी के साथ जोड़ दिया। फिल्म ने दर्शकों को यह महसूस कराया कि सुपरहीरो की दुनिया हमारी भी हो सकती है सुपरहीरो शब्द सुनते ही अक्सर हमारे दिमाग में बड़े शहर, चमकदार इमारतें, अत्याधुनिक तकनीक और महंगे गैजेट्स की तस्वीर आती है। हनु-मैन ने इस कल्पना को बदलने की कोशिश की। इस फिल्म की दुनिया ज्यादा परिचित लगती है। यहां साधारण लोग हैं, स्थानीय ...

पहले नुक्कड़ पर मिलते थे, अब WhatsApp पर—कहां खो गई चाय की महफिल?

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  कुछ साल पहले तक शाम के समय मोहल्ले के नुक्कड़ पर चाय की दुकान के पास भीड़ दिखाई देना आम बात थी। कोई ऑफिस से लौटते हुए रुक गया, कोई बाजार से सामान लेकर आते समय वहीं बैठ गया और किसी दोस्त को तो शायद घर जाने की जल्दी ही नहीं होती थी। चाय का एक गिलास सामने आता और उसके साथ शुरू हो जाती थी लंबी बातचीत। उस बातचीत का कोई तय विषय नहीं होता था। कभी क्रिकेट पर बहस, कभी शहर की खबर, कभी राजनीति और कभी किसी जान-पहचान वाले की शादी की चर्चा। कई बार ऐसी बातें भी होती थीं जिनका कोई मतलब नहीं था, लेकिन फिर भी सबको उनमें मजा आता था। अब जरा आज की शाम की तस्वीर देखिए। वही दोस्त अपने-अपने घर में हैं। किसी के हाथ में मोबाइल है, कोई WhatsApp देख रहा है और कोई किसी समूह में आए संदेश का जवाब दे रहा है। बात हो रही है, लोग जुड़े हुए हैं, लेकिन वह पहले वाली साथ बैठने की आदत कम जरूर हुई है। यही वजह है कि इन दिनों कभी-कभी लगता है कि नुक्कड़ की चाय का पुराना कल्चर धीरे-धीरे पीछे छूट रहा है। चाय तो वही है, बस बैठने वाले बदल गए चाय की दुकानें आज भी हैं। कई जगह तो सुबह से रात तक चहल-पहल रहती है। फर्क दुकान में कम औ...