घेवर की मिठास और रक्षाबंधन का महत्व

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रक्षाबंधन भारत के प्रमुख त्योहारों में से एक है। यह त्योहार भाई-बहन के प्रेम, विश्वास और स्नेह का प्रतीक माना जाता है। इस दिन बहन अपने भाई की कलाई पर राखी बांधती है और भाई उसकी रक्षा का संकल्प लेता है। रक्षाबंधन के त्योहार में मिठाइयों का भी विशेष महत्व होता है, और घेवर इस अवसर की खास मिठाइयों में से एक है।  खास तौर पर राजस्थान, हरियाणा, उत्तर प्रदेश और उत्तर भारत के कई क्षेत्रों में लोकप्रिय है। सावन के मौसम और रक्षाबंधन के आसपास बाजारों में घेवर की अलग-अलग किस्में आसानी से देखने को मिलती हैं। इसकी जालीदार बनावट, कुरकुरापन और मीठा स्वाद त्योहार की खुशी को और बढ़ा देते हैं। रक्षाबंधन पर जब भाई-बहन एक-दूसरे से मिलते हैं, तो मिठाई खिलाकर खुशी बांटने की परंपरा है। ऐसे में घेवर सिर्फ एक मिठाई नहीं, बल्कि त्योहार की खुशियों और पारिवारिक अपनापन का स्वाद बन जाता है।रक्षाबंधन के दिन घर में राखी, पूजा और मिठाइयों की तैयारियां होती हैं। कई परिवारों में घेवर खरीदने या घर पर बनाने की परंपरा भी रही है। भाई को राखी बांधने के बाद उसे घेवर खिलाना इस खास दिन को और यादगार बना देता है। रक्षाबंधन...

डोमिनिक लापिएर ने भारत के लिए क्या किया? सुंदरबन की चिकित्सा नावों की कहानी

 

फ्रांसीसी लेखक स्व डोमिनिक लापिएर का भारत से रिश्ता उनकी किताबों से कहीं ज्यादा गहरा था। कोलकाता और वहां रहने वाले गरीब लोगों के जीवन को करीब से देखने के बाद उन्होंने भारत में मानवीय कार्यों के लिए भी अपना योगदान देना शुरू किया।

उनकी पहचान एक लेखक के रूप में दुनिया भर में बनी, लेकिन भारत में उन्हें उन प्रयासों के लिए भी याद किया जाता है जिनसे जरूरतमंद लोगों तक स्वास्थ्य और दूसरी जरूरी सुविधाएं पहुंचाने में मदद मिली।

भारत से कैसे जुड़ा लापिएर का रिश्ता?

डोमिनिक लापिएर ने कोलकाता में काफी समय बिताया और शहर के आम लोगों के जीवन को करीब से समझा। इन्हीं अनुभवों ने उनकी प्रसिद्ध पुस्तक द सिटी ऑफ जॉय को आकार दिया।

किताब की सफलता के बाद भारत से उनका जुड़ाव और मजबूत हुआ। उन्होंने अपनी पत्नी के साथ मिलकर भारत में कई मानवीय परियोजनाओं को आर्थिक सहायता देने का काम किया।

सुंदरबन की चिकित्सा नाव क्यों खास थी?

सुंदरबन का भूगोल दूसरे इलाकों से बिल्कुल अलग है। यहां नदियां, खाड़ियां और दूर बसे द्वीप हैं, जिसके कारण कई ग्रामीण क्षेत्रों से अस्पताल या स्वास्थ्य केंद्र तक पहुंचना आसान नहीं होता।

ऐसी स्थिति में स्वास्थ्य सेवा को लोगों के पास ले जाने का विचार महत्वपूर्ण बन जाता है। इसी उद्देश्य से चिकित्सा सुविधाओं वाली नावों के जरिए दूरदराज के इलाकों तक पहुंचने की व्यवस्था विकसित की गई।

लापिएर ने ऐसी मानवीय स्वास्थ्य परियोजनाओं को आर्थिक सहयोग दिया। नावों के माध्यम से स्वास्थ्यकर्मी और जरूरी चिकित्सा सुविधाएं उन समुदायों तक पहुंच सकती थीं, जहां नियमित स्वास्थ्य सेवाएं सीमित थीं।

क्या यह पूरा अस्पताल डोमिनिक लापिएर ने बनाया था?

यहां एक बात स्पष्ट रखना जरूरी है। सुंदरबन की चिकित्सा सेवा को केवल डोमिनिक लापिएर द्वारा बनाया या संचालित किया गया अस्पताल कहना सही नहीं होगा।

उनकी भूमिका मुख्य रूप से इन मानवीय प्रयासों को सहायता देने से जुड़ी थी। जमीन पर स्वास्थ्य सेवाएं स्थानीय संस्थाओं और स्वास्थ्यकर्मियों के सहयोग से चलती थीं।

स्वास्थ्य सेवा के अलावा भी किए मदद के प्रयास

भारत में लापिएर से जुड़े मानवीय काम केवल चिकित्सा तक सीमित नहीं थे। शिक्षा, स्वच्छ पानी और कमजोर समुदायों की सहायता जैसे क्षेत्रों में भी सहयोग दिया गया।

उनका मानना था कि जरूरतमंद लोगों की मदद केवल एक समस्या का समाधान करने तक सीमित नहीं होनी चाहिए। बेहतर जीवन के लिए शिक्षा, स्वास्थ्य और बुनियादी सुविधाएं सभी जरूरी हैं।

भारत ने दिया पद्म भूषण

डोमिनिक लापिएर को वर्ष 2008 में भारत के पद्म भूषण सम्मान से सम्मानित किया गया। यह उनके भारत से जुड़े साहित्यिक और मानवीय योगदान की महत्वपूर्ण पहचान थी।

उनका निधन 2 दिसंबर 2022 को 91 वर्ष की उम्र में हुआ। इसके बावजूद भारत के साथ उनका संबंध उनकी पुस्तकों और मानवीय कार्यों के कारण आज भी याद किया जाता है।

डोमिनिक लापिएर की कहानी क्यों खास है?

लापिएर की कहानी इसलिए अलग है क्योंकि उन्होंने भारत को केवल अपनी किताबों का विषय नहीं बनाया। जिन लोगों और परिस्थितियों के बारे में उन्होंने लिखा, उनके लिए मदद के कामों से भी जुड़े।

सुंदरबन की चिकित्सा नावें इसी सोच का एक अच्छा उदाहरण हैं। जहां पानी और दूरी स्वास्थ्य सेवा तक पहुंचने में बाधा बन सकते थे, वहां नाव के माध्यम से सुविधा लोगों के करीब पहुंचाने की कोशिश की गई।

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