गोंधल क्या है? मराठी परंपरा से ऑस्कर तक

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  Gondhal Oscar 2027: मराठी फिल्म ‘गोंधल’ के भारत की आधिकारिक ऑस्कर एंट्री बनने के बाद महाराष्ट्र की एक पारंपरिक लोक-विधि भी चर्चा में आ गई है। आखिर गोंधल क्या है और इस परंपरा का फिल्म से क्या संबंध है? आइए समझते हैं। गोंधल आखिर होता क्या है? महाराष्ट्र में गोंधल एक पारंपरिक धार्मिक अनुष्ठान और लोक-प्रस्तुति है, जिसमें भक्ति, संगीत, गायन और नृत्य का मेल देखने को मिलता है। यह परंपरा कुछ परिवारों में कुलदेवता की पूजा और शुभ अवसरों से जुड़ी रही है। महाराष्ट्र के मराठी विश्वकोश के अनुसार, गोंधल देवी की स्तुति और पूजा से जुड़ा एक कुलाचार है। गोंधल की प्रस्तुति करने वाले कलाकारों को गोंधली कहा जाता है। पारंपरिक प्रस्तुति में देवी-देवताओं की स्तुति, लोकगीत, वाद्य संगीत और नृत्य शामिल होते हैं। शादी जैसे शुभ अवसरों पर भी होती है यह परंपरा गोंधल का संबंध महाराष्ट्र के कुछ परिवारों में विवाह और दूसरे मंगल अवसरों से रहा है। महाराष्ट्र सरकार के गजेटियर में भी इसका उल्लेख मिलता है कि शुभ अवसर के बाद देवी की पूजा और स्तुति के लिए गोंधल की प्रस्तुति की जाती थी। इस दौरान रात में संगीत और नृत्य ...

द समोसा क्वीन: बिग मम्स समोसाज़ की कहानी, जो रसोई से लंदन तक पहुंची

 

एक महिला का वर्षों का हुनर
लंदन में समोसा खाना कोई नई बात नहीं है। भारतीय और दक्षिण एशियाई खाने की लोकप्रियता ने इस छोटे से कुरकुरे नाश्ते को शहर की खाद्य संस्कृति का जाना-पहचाना हिस्सा बना दिया है। लेकिन रिचमंड की एक छोटी-सी दुकान के पीछे की कहानी थोड़ी अलग है। यहां समोसा केवल एक व्यंजन नहीं, बल्कि एक परिवार की कई दशकों पुरानी याद, मेहनत और विरासत का हिस्सा है। इसी कहानी के केंद्र में हैं सुषमा रानी माकोल, जिन्हें उनके परिवार में प्यार से “बिग मम” कहा जाता है।

आज बिग मम्स समोसाज़ का नाम लंदन के समोसा प्रेमियों के बीच जाना जाता है, लेकिन इसकी शुरुआत किसी बड़े रेस्तरां, निवेश या व्यावसायिक योजना से नहीं हुई थी। इसकी शुरुआत घर की रसोई से हुई थी, जहां समोसे परिवार और परिचितों के लिए बनाए जाते थे। धीरे-धीरे लोगों को उनका स्वाद पसंद आने लगा और जो रेसिपी कभी घर तक सीमित थी, वह दूसरों के घरों तक पहुंचने लगी।

यही इस कहानी का सबसे दिलचस्प हिस्सा है। किसी भोजन की लोकप्रियता हमेशा विज्ञापन से नहीं बनती। कभी-कभी वह एक व्यक्ति के हाथ के स्वाद से बनती है, जिसे खाने वाला अगली बार फिर याद करता है।

समोसे की अपनी कहानी इससे भी कहीं पुरानी है। आज भारत में इसे लगभग हर जगह आसानी से पहचाना जाता है, लेकिन इसके शुरुआती रूप मध्य एशिया और पश्चिमी एशिया की पाक परंपराओं से जुड़े माने जाते हैं। अलग-अलग क्षेत्रों और समय में इसके नाम और आकार बदलते रहे। व्यापारियों, यात्रियों और सांस्कृतिक संपर्कों के साथ यह भारतीय उपमहाद्वीप तक पहुंचा और यहां आने के बाद स्थानीय सामग्री और मसालों ने इसे बिल्कुल नया रूप दे दिया।

आलू, मटर, हरी मिर्च और भारतीय मसालों वाला समोसा धीरे-धीरे बाजारों, चाय की दुकानों, घरों और त्योहारों का हिस्सा बन गया। फिर भारतीय समुदायों के दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में बसने के साथ समोसा भी उनके साथ यात्रा करता गया। इस तरह एक ऐसा व्यंजन, जिसकी जड़ें भारतीय उपमहाद्वीप से बाहर की पुरानी पाक परंपराओं में थीं, भारत में अपनी एक अलग पहचान बनाने के बाद लंदन तक पहुंचा।

बिग मम की कहानी इसी लंबी यात्रा का एक आधुनिक अध्याय है।

जब घर के समोसे पहचान बनने लगे

बिग मम पांच दशकों से अधिक समय से समोसे बनाने की कला से जुड़ी रही हैं। उनके लिए समोसा केवल किसी रेसिपी का पालन करना नहीं था। आटा तैयार करने से लेकर उसकी पतली परत बनाने और उसे सही आकार देने तक, यह एक ऐसा हुनर था जो वर्षों के अभ्यास से बेहतर होता गया।

उनके समोसों की सबसे खास बात उनकी पतली परत मानी जाती है। समोसे की दुनिया में यह छोटी बात नहीं है। भरावन चाहे जितनी अच्छी हो, अगर बाहरी परत सही नहीं है तो पूरा अनुभव बदल जाता है। बहुत मोटी परत भरावन के स्वाद को पीछे कर सकती है, जबकि सही पतली परत समोसे को वह हल्का और कुरकुरा एहसास देती है जिसकी तलाश हर समोसा प्रेमी करता है।

बिग मम के हाथों से बने समोसे पहले परिवार और दोस्तों के बीच लोकप्रिय हुए। शुरुआती दिनों में उन्हें घर से ही बेचा जाता था और एक समय इनकी कीमत केवल 20 पेंस थी। उस समय शायद किसी ने नहीं सोचा होगा कि घर के बैठकखाने से निकलने वाला यह छोटा-सा व्यवसाय एक दिन लंदन में अपनी अलग पहचान बनाएगा।

लेकिन खाने की दुनिया में अच्छी चीजों की अपनी एक यात्रा होती है। एक व्यक्ति दूसरे को बताता है, फिर कोई तीसरा उसे आजमाता है और धीरे-धीरे एक स्वाद अपनी जगह बना लेता है।

बिग मम के समोसों के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ।

साल 2020 में उनके पोते-पोतियों ने इस पारिवारिक रेसिपी को एक औपचारिक व्यवसाय के रूप में आगे बढ़ाया। यहां कहानी केवल व्यापार बढ़ाने की नहीं थी। उद्देश्य उस स्वाद को सुरक्षित रखना भी था जो परिवार के लिए वर्षों से खास रहा था। एक पीढ़ी ने रेसिपी को संभाला था और अगली पीढ़ी ने उसे नई दुनिया तक पहुंचाने का रास्ता खोजा।

यहीं से बिग मम्स समोसाज़ की कहानी एक घरेलू रेसिपी से आगे बढ़कर एक पारिवारिक ब्रांड की कहानी बनती है।

रिचमंड की ब्रुअर्स लेन पर दुकान खुलना इस सफर का एक महत्वपूर्ण पड़ाव था। आज वहां आने वाला व्यक्ति केवल समोसा खरीदने नहीं आता। वह अनजाने में उस कहानी का हिस्सा बन जाता है जो कई दशक पहले एक घर की रसोई में शुरू हुई थी।

इस सफर में परंपरा को बनाए रखते हुए नए प्रयोग भी हुए। पारंपरिक स्वादों के साथ मौसमी और अलग तरह के स्वादों को आजमाया गया। यही किसी पुराने पारिवारिक व्यंजन को जीवित रखने का एक तरीका है। विरासत का अर्थ हमेशा हर चीज को बिल्कुल उसी तरह दोहराना नहीं होता। कभी-कभी उसकी मूल भावना को बचाकर उसे नए समय के साथ आगे ले जाना भी विरासत का हिस्सा होता है।

बिग मम की कहानी को एक और खास पहचान तब मिली जब 2023 में उन्हें टेलीविजन कार्यक्रम “बिग ज़ूज़ बिग ईट्स” में अपने समोसे बनाने के लिए आमंत्रित किया गया। उनके साथ सर मो फराह भी कार्यक्रम में दिखाई दिए। घर की रसोई से शुरू हुई यात्रा का टेलीविजन तक पहुंचना उस कहानी का यादगार पड़ाव था।

फिर भी, शायद बिग मम की सबसे बड़ी उपलब्धि टेलीविजन पर दिखाई देना या एक दुकान खोलना नहीं है।

असली उपलब्धि यह है कि पांच दशक से अधिक समय बाद भी उनके नाम के साथ वही व्यंजन जुड़ा हुआ है जिससे यह सफर शुरू हुआ था।

एक रेसिपी को कुछ दिनों तक दोहराना आसान है। उसे वर्षों तक बनाए रखना मुश्किल है। लेकिन उसे अगली पीढ़ी को सौंपना और फिर उस अगली पीढ़ी का उसे आगे लेकर जाना उससे भी ज्यादा खास है।

यही वजह है कि “द समोसा क्वीन” नाम केवल एक आकर्षक उपनाम जैसा नहीं लगता। इसके पीछे वर्षों का अभ्यास, परिवार की भागीदारी और लोगों की याद में बना एक स्वाद है।

समोसा सदियों पहले एक लंबी यात्रा पर निकला था। उसने रास्ते में अपनी शक्ल बदली, सामग्री बदली और अलग-अलग संस्कृतियों का स्वाद अपनाया। भारत में उसे एक नई पहचान मिली और भारतीय परिवारों के साथ वह दुनिया के दूसरे हिस्सों तक पहुंचा।

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