घेवर की मिठास और रक्षाबंधन का महत्व
दुनिया में जब भी किसी बड़े युद्ध या अंतरराष्ट्रीय संघर्ष की खबर सामने आती है, एक सवाल जरूर उठता है कि अगर संयुक्त राष्ट्र यानी UNO का मुख्य उद्देश्य दुनिया में शांति बनाए रखना और देशों के बीच विवादों को बातचीत के जरिए सुलझाना है, तो फिर अलग-अलग हिस्सों में संघर्ष क्यों बढ़ते जा रहे हैं? क्या संयुक्त राष्ट्र अब इतना कमजोर हो चुका है कि वह दुनिया के देशों को युद्ध से रोक नहीं सकता? यह सवाल आज इसलिए भी महत्वपूर्ण हो गया है क्योंकि अंतरराष्ट्रीय राजनीति पहले की तुलना में कहीं ज्यादा जटिल हो चुकी है। एक तरफ देशों के बीच आर्थिक और राजनीतिक संबंध हैं, तो दूसरी तरफ सैन्य शक्ति, क्षेत्रीय हित और बड़ी शक्तियों के बीच बढ़ती प्रतिस्पर्धा भी दिखाई देती है।
दूसरे विश्व युद्ध ने पूरी दुनिया को यह समझा दिया था कि अगर देशों के बीच विवादों को रोकने और बातचीत का कोई मजबूत अंतरराष्ट्रीय मंच नहीं होगा, तो छोटे से विवाद के भी बड़े युद्ध में बदलने का खतरा बना रहेगा। इसी सोच के साथ 1945 में संयुक्त राष्ट्र की स्थापना हुई। इसका उद्देश्य केवल युद्ध रोकना ही नहीं था, बल्कि देशों के बीच सहयोग बढ़ाना, अंतरराष्ट्रीय कानून और कूटनीति को मजबूत करना तथा मानवता से जुड़े बड़े मुद्दों पर मिलकर काम करना भी था। पिछले कई दशकों में संयुक्त राष्ट्र ने
दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में शांति अभियानों, मानवीय सहायता और अंतरराष्ट्रीय बातचीत के जरिए महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इसलिए इसे केवल युद्ध रोकने वाली संस्था के रूप में देखना सही नहीं होगा।संयुक्त राष्ट्र की सबसे बड़ी समस्या यह है कि उसके पास दुनिया की किसी सरकार की तरह असीमित शक्ति नहीं है। किसी देश को युद्ध रोकने के लिए मजबूर करना हमेशा उसके लिए संभव नहीं होता। खासकर तब जब किसी संघर्ष में दुनिया की बड़ी शक्तियों के हित सीधे जुड़े हों। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में अमेरिका, रूस, चीन, फ्रांस और ब्रिटेन जैसे पांच स्थायी सदस्य हैं और इनके पास वीटो का अधिकार है। इसका मतलब यह है कि किसी महत्वपूर्ण प्रस्ताव पर एक स्थायी सदस्य की असहमति भी निर्णय को रोक सकती है। यही व्यवस्था कई बार अंतरराष्ट्रीय समुदाय की सामूहिक कार्रवाई को मुश्किल बना देती है और आम लोगों के बीच यह धारणा बनती है कि UNO केवल बयान देने तक सीमित रह गया है।
ऐसा कहना शायद जल्दबाजी होगी। संयुक्त राष्ट्र आज भी दुनिया के सबसे बड़े अंतरराष्ट्रीय मंचों में से एक है, जहां लगभग सभी देश वैश्विक मुद्दों पर अपनी बात रखते हैं। युद्ध और संघर्ष के समय भी संयुक्त राष्ट्र मानवीय सहायता, शांति वार्ता, नागरिकों की सुरक्षा और संघर्ष प्रभावित क्षेत्रों में राहत पहुंचाने जैसे काम करता है। कई परिस्थितियों में किसी बड़े युद्ध को तुरंत रोक पाना संभव नहीं होता, लेकिन बातचीत का रास्ता खुला रखना, तनाव कम करने की कोशिश करना और प्रभावित लोगों तक सहायता पहुंचाना भी कम महत्वपूर्ण काम नहीं है। इसलिए UNO की भूमिका को केवल इस आधार पर नहीं मापा जा सकता कि उसने कितने युद्धों को पूरी तरह रोक दिया।
शायद इस सवाल का जवाब दोनों के बीच कहीं है। संयुक्त राष्ट्र की व्यवस्था काफी हद तक सदस्य देशों की इच्छा और सहयोग पर निर्भर करती है। जब शक्तिशाली देश किसी मुद्दे पर एकमत होते हैं, तब संयुक्त राष्ट्र प्रभावी भूमिका निभा सकता है, लेकिन जब बड़ी शक्तियां खुद एक-दूसरे के खिलाफ खड़ी हो जाती हैं, तो सुरक्षा परिषद में सहमति बनाना मुश्किल हो जाता है। यही कारण है कि कई अंतरराष्ट्रीय विवादों में UNO की सीमाएं साफ दिखाई देती हैं। एक तरह से देखा जाए तो संयुक्त राष्ट्र के पास बातचीत की मेज, नियम और अंतरराष्ट्रीय मंच जरूर है, लेकिन उस मंच पर लिए गए फैसलों को प्रभावी बनाने के लिए सदस्य देशों का सहयोग जरूरी है।
आज की दुनिया 1945 की दुनिया से काफी अलग है। उस समय अंतरराष्ट्रीय शक्ति-संतुलन कुछ अलग था, जबकि आज एशिया, यूरोप, अमेरिका, अफ्रीका और दुनिया के दूसरे क्षेत्रों में कई देश आर्थिक, राजनीतिक और सैन्य रूप से महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। ऐसे में यह सवाल लगातार उठता है कि क्या संयुक्त राष्ट्र की मौजूदा संरचना आज की वास्तविक दुनिया का सही प्रतिनिधित्व करती है। सुरक्षा परिषद में सुधार, वीटो के इस्तेमाल को लेकर बहस और विकासशील देशों को ज्यादा प्रतिनिधित्व देने की मांग इसी चर्चा का हिस्सा हैं। अगर संयुक्त राष्ट्र को आने वाले दशकों में भी प्रभावी बने रहना है, तो बदलती वैश्विक परिस्थितियों के अनुसार उसकी व्यवस्था में सुधार पर गंभीरता से विचार करना होगा।
दुनिया में बढ़ते संघर्ष निश्चित रूप से यह संकेत देते हैं कि मौजूदा अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था में कई कमियां हैं। लेकिन इन संघर्षों को देखकर यह कहना कि UNO पूरी तरह विफल हो चुका है, वास्तविक स्थिति को बहुत सरल बना देना होगा। संयुक्त राष्ट्र की सफलता या असफलता केवल उसके अपने फैसलों पर निर्भर नहीं करती, बल्कि इस बात पर भी निर्भर करती है कि सदस्य देश उसके नियमों और फैसलों को कितना महत्व देते हैं। अगर दुनिया के शक्तिशाली देश अपने राष्ट्रीय हितों को हर परिस्थिति में प्राथमिकता देंगे और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के साथ सहयोग नहीं करेंगे, तो किसी भी वैश्विक संगठन की क्षमता सीमित हो जाएगी।
इसलिए सवाल यह नहीं होना चाहिए कि UNO खत्म हो चुका है या नहीं, बल्कि यह होना चाहिए कि क्या मौजूदा UNO आज की बदलती दुनिया के लिए पर्याप्त रूप से मजबूत और प्रभावी है। संयुक्त राष्ट्र के सामने निश्चित रूप से बड़ी चुनौतियां हैं, लेकिन उसके पास ऐसा अंतरराष्ट्रीय मंच भी है जिसकी आज की दुनिया में जरूरत पहले से कम नहीं हुई है। शायद समस्या UNO के अस्तित्व की नहीं, बल्कि उसकी कार्यप्रणाली और उसे समर्थन देने वाली वैश्विक राजनीतिक इच्छा की है। अगर दुनिया के देश वास्तव में युद्धों को कम करना चाहते हैं, तो केवल संयुक्त राष्ट्र से उम्मीद करना काफी नहीं होगा; उन्हें खुद भी बातचीत, अंतरराष्ट्रीय कानून और सहयोग को प्राथमिकता देनी होगी। UNO की ताकत आखिरकार उतनी ही होगी, जितनी ताकत दुनिया के देश मिलकर उसे देने के लिए तैयार हैं।
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