डिग्री है, नौकरी नहीं: भारतीय युवाओं के सामने रोजगार की असली चुनौती क्या है ?

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कॉलेज की पढ़ाई पूरी होने के बाद हाथ में डिग्री और आंखों में बेहतर भविष्य का सपना लिए हर साल लाखों युवा नौकरी की तलाश शुरू करते हैं। किसी को प्रतियोगी परीक्षाओं में सफलता का इंतजार है, तो कोई निजी कंपनियों में लगातार आवेदन कर रहा है। कुछ युवा ऐसे भी हैं, जिन्हें नौकरी तो मिल रही है, लेकिन वेतन उनकी योग्यता और उम्मीदों के अनुरूप नहीं है। सवाल सिर्फ बेरोजगारी का नहीं है। सवाल यह भी है कि शिक्षा पर वर्षों खर्च करने के बावजूद युवाओं को उनकी योग्यता के अनुसार अवसर क्यों नहीं मिल पा रहे हैं? डिग्री और नौकरी के बीच बढ़ती दूरी भारत में उच्च शिक्षा का विस्तार हुआ है। छोटे शहरों और कस्बों से भी बड़ी संख्या में छात्र इंजीनियरिंग, मैनेजमेंट और अन्य व्यावसायिक पाठ्यक्रमों की ओर बढ़ रहे हैं। लेकिन डिग्री हासिल करना और नौकरी के लिए तैयार होना दो अलग बातें हैं। कई नियोक्ता अब शैक्षणिक योग्यता के साथ व्यावहारिक अनुभव, तकनीकी दक्षता, संवाद क्षमता और समस्या सुलझाने की योग्यता को भी महत्व देते हैं। ऐसे में केवल परीक्षा पास करने पर केंद्रित शिक्षा युवाओं की मुश्किलें बढ़ा सकती है। हालांकि रोजगार की कमी का प...

डिजिटल दुनिया की मार : आँखें थकीं, कान पके

 अब तो आँखें और कान भी छुट्टी पर हैं

आज के आधुनिक युग में इंसान तो जाग रहा है, पर उसकी आँखें और कान लगता है छुट्टी पर चले गए हैं।कभी जो आँखें समझने के लिए खुलती थीं, अब वो सिर्फ़ मोबाइल स्क्रीन देखने के लिए खुलती हैं।और जो कान “सुनने” के लिए बने थे, वो अब बस ब्लूटूथ ईयरफ़ोन में गाने भरते रहते हैं।

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आँखें अब क्या देखती हैं?

पहले आँखें प्रकृति की हरियाली, लोगों के चेहरे का भाव और आसमान में उड़ते पंछी देखती थीं।अब तो आँखें दिनभर बस स्क्रीन टाइम रिपोर्ट देखती हैं  “आपका औसत उपयोग 8 घंटे 43 मिनट।”कभी-कभी तो लगता है आँखें बोल दें “भाई, ज़रा हमें भी चार्जर लगा दो”

और कानों की हालत तो और भी मज़ेदार है

पहले कान पड़ोसी की गपशप, दादी की कहानियाँ और माँ की डाँट सुनते थे।अब कान बस

एक ही आवाज़ पहचानते हैं “नया नोटिफिकेशन आया है”,लोग अब किसी की बात कम, और रील्स का साउंड ज़्यादा सुनते हैं।कान तो बेचारे कब से कह रहे हैं “थोड़ा शांति चाहिए भाई”

सोशल मीडिया ने सबको सुपरहीरो बना दिया है

आँखें झपकने से पहले कैमरा ऑन, और कानों के लिए इयरफ़ोन ऑन ,अब तो हर इंसान अपने ही छोटे-से फ़िल्मी सेट में जी रहा है।कभी आँखें थक जाती हैं, तो वो भी सोचती हैं  “काश, हमें भी एयरप्लेन मोड मिल जाता”


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