डिजिटल दुनिया की मार : आँखें थकीं, कान पके

 अब तो आँखें और कान भी छुट्टी पर हैं

आज के आधुनिक युग में इंसान तो जाग रहा है, पर उसकी आँखें और कान लगता है छुट्टी पर चले गए हैं।कभी जो आँखें समझने के लिए खुलती थीं, अब वो सिर्फ़ मोबाइल स्क्रीन देखने के लिए खुलती हैं।और जो कान “सुनने” के लिए बने थे, वो अब बस ब्लूटूथ ईयरफ़ोन में गाने भरते रहते हैं।

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आँखें अब क्या देखती हैं?

पहले आँखें प्रकृति की हरियाली, लोगों के चेहरे का भाव और आसमान में उड़ते पंछी देखती थीं।अब तो आँखें दिनभर बस स्क्रीन टाइम रिपोर्ट देखती हैं  “आपका औसत उपयोग 8 घंटे 43 मिनट।”कभी-कभी तो लगता है आँखें बोल दें “भाई, ज़रा हमें भी चार्जर लगा दो”

और कानों की हालत तो और भी मज़ेदार है

पहले कान पड़ोसी की गपशप, दादी की कहानियाँ और माँ की डाँट सुनते थे।अब कान बस

एक ही आवाज़ पहचानते हैं “नया नोटिफिकेशन आया है”,लोग अब किसी की बात कम, और रील्स का साउंड ज़्यादा सुनते हैं।कान तो बेचारे कब से कह रहे हैं “थोड़ा शांति चाहिए भाई”

सोशल मीडिया ने सबको सुपरहीरो बना दिया है

आँखें झपकने से पहले कैमरा ऑन, और कानों के लिए इयरफ़ोन ऑन ,अब तो हर इंसान अपने ही छोटे-से फ़िल्मी सेट में जी रहा है।कभी आँखें थक जाती हैं, तो वो भी सोचती हैं  “काश, हमें भी एयरप्लेन मोड मिल जाता”


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