फोन पर वीडियो देखने का नशा: कितना खतरनाक है?

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  सुबह आंख खुलते ही फोन पर वीडियो देखना, खाना खाते समय रील्स चलाना, खाली समय में लगातार शॉर्ट वीडियो स्क्रॉल करना और रात को सोने से पहले “बस एक वीडियो और” कहना—आज यह आदत बहुत सामान्य हो गई है। वीडियो देखना अपने आप में नुकसानदायक नहीं है। फोन से मनोरंजन के साथ-साथ पढ़ाई, समाचार और जानकारी भी मिलती है। समस्या तब शुरू होती है जब वीडियो देखने का समय हमारे नियंत्रण से बाहर होने लगे और जरूरी काम, नींद, पढ़ाई, नौकरी या परिवार के साथ बिताया समय पीछे छूटने लगे। यही वजह है कि फोन पर वीडियो देखने की आदत कब सामान्य मनोरंजन से आगे बढ़ जाती है और कब चिंता का कारण बन सकती है, इसे समझना जरूरी है। क्या फोन पर वीडियो देखना सच में “नशा” है? बोलचाल की भाषा में लोग किसी ऐसी आदत को “नशा” कह देते हैं जिसे छोड़ना मुश्किल महसूस हो। लेकिन हर व्यक्ति जो लंबे समय तक वीडियो देखता है, उसे चिकित्सकीय रूप से “आदी” कहना सही नहीं होगा। असल चिंता तब होती है जब व्यक्ति वीडियो देखने पर नियंत्रण नहीं रख पाता, दूसरी जरूरी गतिविधियों पर उसका असर पड़ने लगता है और नुकसान दिखाई देने के बावजूद वह अपनी आदत को कम नहीं कर पाता।...

भारत में टूटते संयुक्त pariwar जब एक ही छत के नीचे रहने वाले दिल अलग-अलग कमरों में बँट गए



कभी भारतीय समाज की सबसे मज़बूत पहचान संयुक्त परिवार हुआ करता था, जहाँ एक ही आँगन में कई पीढ़ियाँ साँस लेती थीं और जीवन की हर खुशी-ग़म साझा होता था। दादा की लाठी की ठक-ठक, दादी की कहानियों की गर्माहट, माँ की रसोई से आती खुशबू और बच्चों की किलकारियाँ मिलकर एक ऐसा संसार रचती थीं, जो सुरक्षा और अपनापन दोनों देता था। 

लेकिन समय के साथ यह तस्वीर धुंधली होती चली गई। रोज़गार की मजबूरियाँ, शहरों की भागदौड़, व्यक्तिगत स्वतंत्रता की बढ़ती चाह और सोच में आया बदलाव धीरे-धीरे उसी छत को भारी लगने लगा, जो कभी सबसे बड़ा सहारा थी। अब संवाद की जगह चुप्पी ने ले ली है, समायोजन की जगह अहंकार ने और साझा जिम्मेदारियों की जगह व्यक्तिगत सीमाओं ने। 

छोटे-छोटे मतभेद, जिन्हें पहले हँसकर टाल दिया जाता था, आज रिश्तों में दरार बनकर उभर आते हैं। संयुक्त परिवार का टूटना केवल लोगों का अलग-अलग घरों में बँटना नहीं है, यह अनुभवों, संस्कारों और भावनात्मक सहारे का बिखरना भी है। बच्चों के लिए दादा-दादी की गोद अब कहानियों तक सिमट गई है और बुज़ुर्गों के लिए भरा-पूरा घर एकांत में बदलता जा रहा है। 

आधुनिकता ने सुविधाएँ दी हैं, लेकिन कहीं न कहीं रिश्तों की ऊष्मा छीन ली है। सवाल यह नहीं है कि बदलाव गलत है या सही, सवाल यह है कि क्या हम आगे बढ़ते हुए अपने रिश्तों की जड़ों को संभाल पा रहे हैं। अगर समय रहते संवाद, समझ और सम्मान को फिर से जीवन में जगह दी जाए, तो शायद टूटते संयुक्त परिवार की यह कहानी पूरी तरह बिखरने से बच सकती है।

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