ज़ायके का संगम: वो शहर जहाँ की सुबह कढ़ी कचौड़ी की खुशबू से होती है गुलज़ार

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  भारतीय खान-पान की दुनिया में कचौड़ी का नाम आते ही मन में एक करारा और तीखा स्वाद घुल जाता है, लेकिन जब इसी खस्ता कचौड़ी के ऊपर गरमा-गरम चटपटी कढ़ी डाली जाती है, तो वह स्वाद एक नया ही अनुभव बन जाता है। भारत के कई शहरों में कढ़ी-कचौड़ी केवल एक नाश्ता नहीं बल्कि वहाँ की जीवनशैली और संस्कृति का अहम हिस्सा है। राजस्थान का ajmer    शहर इस मामले में सबसे आगे है, जहाँ के केसरगंज और गोल प्याऊ जैसे इलाकों में सुबह होते ही कढ़ी-कचौड़ी की खुशबू हर गली में महकने लगती है। यहाँ की खास बात यह है कि दाल की कचौड़ी को मथकर उसके ऊपर बेसन की पतली और मसालेदार कढ़ी डाली जाती है, जो सेलिब्रिटीज से लेकर आम आदमी तक सबको दीवाना बना देती है। राजस्थान का ही एक और ज़िला bhartpur  अपनी छोटी कचौड़ियों के लिए 'सिटी ऑफ कचौड़ी' के नाम से विख्यात है। यहाँ कढ़ी के साथ छोटी-छोटी कुरकुरी कचौड़ियाँ परोसी जाती हैं, जो बाहरी पर्यटकों के लिए भी एक बड़ा आकर्षण हैं। इसके अलावाjalor  में दही और कढ़ी के साथ कचौड़ी का कॉम्बो काफी लोकप्रिय है। मध्य प्रदेश केindore  औरjallor जैसे शहरों में ...

जमीं पर बैठकर भोजन: परंपरा, स्वास्थ्य और परिवार का मेल


भारत में भोजन केवल पेट भरने का साधन नहीं रहा, बल्कि यह संस्कृति, परंपरा और सामाजिक आदतों का भी हिस्सा रहा है। वर्षों पहले तक हमारे देश में खाना हमेशा जमीं पर बैठकर ही खाया जाता था। परिवार और रिश्तेदार इकट्ठा होकर फर्श पर बैठते, थाली हाथ में पकड़कर भोजन करते और खाने का समय न केवल स्वादिष्ट बल्कि सामूहिक आनंद का भी समय होता था।

लेकिन आज की तेज़-तर्रार जिंदगी ने इस प्रथा को लगभग समाप्त कर दिया है। आधुनिक घरों में डाइनिंग टेबल और कुर्सियों ने जमीं पर बैठकर खाने की जगह ले ली है। अब परिवार के सदस्य अलग-अलग कमरों में फोन या टीवी के सामने बैठकर खाना खाते हैं। इस बदलाव के कई कारण हैं। एक तो जीवनशैली का तेज़ होना, दूसरा आधुनिक सुविधाओं का आना, और तीसरा शहरी जीवन की भीड़भाड़ और समय की कमी।

पारंपरिक जमीं पर बैठकर खाने की प्रथा न केवल भोजन को आनंदमय बनाती थी, बल्कि इससे शारीरिक स्वास्थ्य पर भी सकारात्मक प्रभाव पड़ता था। जमीन पर बैठकर खाने से पाचन क्रिया बेहतर होती थी, मुद्रा में सुधार आता था और भोजन का हर निवाला धीरे-धीरे चबाया जाता था। इसके अलावा, यह परंपरा परिवारिक सामूहिकता और संवाद को बढ़ाती थी। खाने के समय बच्चे, बड़े और बुजुर्ग एक साथ बैठते और बातचीत का आनंद लेते।

आज जबकि हम आधुनिकता की ओर बढ़ रहे हैं, इस प्रथा का महत्व धीरे-धीरे खोता जा रहा है। जबकि डाइनिंग टेबल सुविधाजनक जरूर हैं, लेकिन जमीं पर बैठकर खाने का सामाजिक और स्वास्थ्य लाभ अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है। कई लोग अब भी अपने बच्चों को इस परंपरा से जोड़ने की कोशिश करते हैं, ताकि वे खाने को केवल भोजन न समझें बल्कि संस्कृति और पारिवारिक मूल्य के रूप में भी अपनाएं।

संक्षेप में कहा जाए, तो भारत में जमीं पर बैठकर खाने की प्रथा अब सिर्फ यादों और कथाओं में बची है। यह बदलाव समय की मांग है, लेकिन यह हमें याद दिलाता है कि कभी हमारे भोजन का अनुभव केवल स्वाद का नहीं बल्कि संस्कृति, स्वास्थ्य और परिवार के मिलन का प्रतीक भी था। 

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