ज़ायके का संगम: वो शहर जहाँ की सुबह कढ़ी कचौड़ी की खुशबू से होती है गुलज़ार

चित्र
  भारतीय खान-पान की दुनिया में कचौड़ी का नाम आते ही मन में एक करारा और तीखा स्वाद घुल जाता है, लेकिन जब इसी खस्ता कचौड़ी के ऊपर गरमा-गरम चटपटी कढ़ी डाली जाती है, तो वह स्वाद एक नया ही अनुभव बन जाता है। भारत के कई शहरों में कढ़ी-कचौड़ी केवल एक नाश्ता नहीं बल्कि वहाँ की जीवनशैली और संस्कृति का अहम हिस्सा है। राजस्थान का ajmer    शहर इस मामले में सबसे आगे है, जहाँ के केसरगंज और गोल प्याऊ जैसे इलाकों में सुबह होते ही कढ़ी-कचौड़ी की खुशबू हर गली में महकने लगती है। यहाँ की खास बात यह है कि दाल की कचौड़ी को मथकर उसके ऊपर बेसन की पतली और मसालेदार कढ़ी डाली जाती है, जो सेलिब्रिटीज से लेकर आम आदमी तक सबको दीवाना बना देती है। राजस्थान का ही एक और ज़िला bhartpur  अपनी छोटी कचौड़ियों के लिए 'सिटी ऑफ कचौड़ी' के नाम से विख्यात है। यहाँ कढ़ी के साथ छोटी-छोटी कुरकुरी कचौड़ियाँ परोसी जाती हैं, जो बाहरी पर्यटकों के लिए भी एक बड़ा आकर्षण हैं। इसके अलावाjalor  में दही और कढ़ी के साथ कचौड़ी का कॉम्बो काफी लोकप्रिय है। मध्य प्रदेश केindore  औरjallor जैसे शहरों में ...

आस्था, परंपरा और संस्कृति का महासंगम : माघ मेला, प्रयागराज

 

3 Jan. to 15 feb,2026 at allhabad,
भारत की आध्यात्मिक परंपरा में माघ मेला एक ऐसा पर्व है, जो आस्था, तप और संस्कृति का अद्भुत संगम प्रस्तुत करता है। उत्तर प्रदेश के प्रयागराज में गंगा, यमुना और अदृश्य सरस्वती के पवित्र संगम तट पर लगने वाला यह मेला हर वर्ष माघ महीने में श्रद्धालुओं को अपनी ओर आकर्षित करता है। जैसे ही माघ का शुभ आरंभ होता है, पूरा संगम क्षेत्र भक्ति, साधना और उत्सव के रंग में रंग जाता है।

माघ मेला केवल स्नान का पर्व नहीं है, बल्कि यह आत्मशुद्धि और आध्यात्मिक जागरण का अवसर भी माना जाता है। दूर-दराज़ से आए संत, महात्मा, कल्पवासी और श्रद्धालु संगम में पवित्र डुबकी लगाकर अपने जीवन को पुण्य से भरने की कामना करते हैं। मान्यता है कि माघ महीने में संगम में स्नान करने से जन्म-जन्मांतर के पाप नष्ट हो जाते हैं और मोक्ष की प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त होता है।

मेले के दौरान संगम तट पर अस्थायी नगर बस जाता है, जहाँ टेंट, आश्रम और अखाड़े अपनी अलग ही दुनिया रचते हैं। सुबह-सुबह गंगा तट पर जलती दीपों की कतार, मंत्रोच्चार की ध्वनि और उगते सूर्य को अर्घ्य देते श्रद्धालु मन को गहरी शांति प्रदान करते हैं। दिन भर प्रवचन, भजन-कीर्तन और धार्मिक चर्चाओं का वातावरण बना रहता है, जिससे पूरा क्षेत्र आध्यात्मिक ऊर्जा से भर जाता है।

माघ मेले में कल्पवास की परंपरा का विशेष महत्व है। कल्पवासी पूरे महीने संयमित जीवन व्यतीत करते हैं, सात्विक भोजन ग्रहण करते हैं और नियमित स्नान व पूजा-पाठ में लीन रहते हैं। यह जीवनशैली आत्मसंयम और अनुशासन का अनुपम उदाहरण प्रस्तुत करती है, जो आधुनिक जीवन में भी प्रेरणा देती है।

धार्मिक महत्व के साथ-साथ माघ मेला भारतीय संस्कृति और लोकजीवन की झलक भी दिखाता है। यहाँ ग्रामीण संस्कृति, लोककला, पारंपरिक खान-पान और मेलों की रौनक देखने को मिलती है। साधु-संतों के अखाड़े, नागा साधुओं की झलक और धार्मिक शोभायात्राएँ मेले की भव्यता को और बढ़ा देती हैं।

माघ मेला प्रयागराज की पहचान और भारत की सांस्कृतिक धरोहर का जीवंत प्रतीक है। यह मेला हमें हमारी जड़ों से जोड़ता है और यह एहसास कराता है कि आस्था और परंपरा आज भी हमारे जीवन में कितनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। संगम की पावन धरती पर लगने वाला यह मेला न केवल शरीर को, बल्कि मन और आत्मा को भी शुद्ध करने का अवसर प्रदान करता है।














टिप्पणियाँ

लोकप्रिय पोस्ट

ग्रीस में 3,100 से अधिक 100 साल की उम्र वाले लोग: लंबी उम्र का रहस्य

दुनिया की पहली फोटो की कहानी

प्रीवेडिंग शूट का नया ट्रेंड: उदयपुर की खूबसूरत लोकेशंस

केरल की शांतिपूर्ण कुमाराकोम यात्रा: 4 दिन की कहानी

माहे: भारत का सबसे छोटा शहर

बीकानेर राजस्थान के इतिहास की धरोहर

दीपावली यूनेस्को की सांस्कृतिक विरासत सूची में शामिल

भारत के पतंग उत्सव रंग उमंग और परंपराओं का अनोखा संगम

पुदुचेरी, जिसे पहले पांडिचेरी के नाम से जाना जाता था

केरल का पहला पेपरलेस कोर्ट : न्याय का डिजिटल युग