ज़ायके का संगम: वो शहर जहाँ की सुबह कढ़ी कचौड़ी की खुशबू से होती है गुलज़ार
माघ मेला केवल स्नान का पर्व नहीं है, बल्कि यह आत्मशुद्धि और आध्यात्मिक जागरण का अवसर भी माना जाता है। दूर-दराज़ से आए संत, महात्मा, कल्पवासी और श्रद्धालु संगम में पवित्र डुबकी लगाकर अपने जीवन को पुण्य से भरने की कामना करते हैं। मान्यता है कि माघ महीने में संगम में स्नान करने से जन्म-जन्मांतर के पाप नष्ट हो जाते हैं और मोक्ष की प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त होता है।
मेले के दौरान संगम तट पर अस्थायी नगर बस जाता है, जहाँ टेंट, आश्रम और अखाड़े अपनी अलग ही दुनिया रचते हैं। सुबह-सुबह गंगा तट पर जलती दीपों की कतार, मंत्रोच्चार की ध्वनि और उगते सूर्य को अर्घ्य देते श्रद्धालु मन को गहरी शांति प्रदान करते हैं। दिन भर प्रवचन, भजन-कीर्तन और धार्मिक चर्चाओं का वातावरण बना रहता है, जिससे पूरा क्षेत्र आध्यात्मिक ऊर्जा से भर जाता है।
माघ मेले में कल्पवास की परंपरा का विशेष महत्व है। कल्पवासी पूरे महीने संयमित जीवन व्यतीत करते हैं, सात्विक भोजन ग्रहण करते हैं और नियमित स्नान व पूजा-पाठ में लीन रहते हैं। यह जीवनशैली आत्मसंयम और अनुशासन का अनुपम उदाहरण प्रस्तुत करती है, जो आधुनिक जीवन में भी प्रेरणा देती है।
धार्मिक महत्व के साथ-साथ माघ मेला भारतीय संस्कृति और लोकजीवन की झलक भी दिखाता है। यहाँ ग्रामीण संस्कृति, लोककला, पारंपरिक खान-पान और मेलों की रौनक देखने को मिलती है। साधु-संतों के अखाड़े, नागा साधुओं की झलक और धार्मिक शोभायात्राएँ मेले की भव्यता को और बढ़ा देती हैं।
माघ मेला प्रयागराज की पहचान और भारत की सांस्कृतिक धरोहर का जीवंत प्रतीक है। यह मेला हमें हमारी जड़ों से जोड़ता है और यह एहसास कराता है कि आस्था और परंपरा आज भी हमारे जीवन में कितनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। संगम की पावन धरती पर लगने वाला यह मेला न केवल शरीर को, बल्कि मन और आत्मा को भी शुद्ध करने का अवसर प्रदान करता है।
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