ज़ायके का संगम: वो शहर जहाँ की सुबह कढ़ी कचौड़ी की खुशबू से होती है गुलज़ार

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  भारतीय खान-पान की दुनिया में कचौड़ी का नाम आते ही मन में एक करारा और तीखा स्वाद घुल जाता है, लेकिन जब इसी खस्ता कचौड़ी के ऊपर गरमा-गरम चटपटी कढ़ी डाली जाती है, तो वह स्वाद एक नया ही अनुभव बन जाता है। भारत के कई शहरों में कढ़ी-कचौड़ी केवल एक नाश्ता नहीं बल्कि वहाँ की जीवनशैली और संस्कृति का अहम हिस्सा है। राजस्थान का ajmer    शहर इस मामले में सबसे आगे है, जहाँ के केसरगंज और गोल प्याऊ जैसे इलाकों में सुबह होते ही कढ़ी-कचौड़ी की खुशबू हर गली में महकने लगती है। यहाँ की खास बात यह है कि दाल की कचौड़ी को मथकर उसके ऊपर बेसन की पतली और मसालेदार कढ़ी डाली जाती है, जो सेलिब्रिटीज से लेकर आम आदमी तक सबको दीवाना बना देती है। राजस्थान का ही एक और ज़िला bhartpur  अपनी छोटी कचौड़ियों के लिए 'सिटी ऑफ कचौड़ी' के नाम से विख्यात है। यहाँ कढ़ी के साथ छोटी-छोटी कुरकुरी कचौड़ियाँ परोसी जाती हैं, जो बाहरी पर्यटकों के लिए भी एक बड़ा आकर्षण हैं। इसके अलावाjalor  में दही और कढ़ी के साथ कचौड़ी का कॉम्बो काफी लोकप्रिय है। मध्य प्रदेश केindore  औरjallor जैसे शहरों में ...

लखनऊ नजाकत नफासत का संगम नवाबों का शहर



भारत के हृदय स्थल उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ सिर्फ एक शहर नहीं, बल्कि एक जीती-जागती विरासत है। इसे 'नवाबों का शहर' और 'पूर्व का स्वर्ण नगर' कहा जाता है। गोमती नदी के किनारे बसा यह शहर अपनी 'पहले आप' वाली तहजीब, अदब और नजाकत के लिए पूरी दुनिया में मशहूर है। लखनऊ का इतिहास नवाबों के शासनकाल से गहराई से जुड़ा है, जिन्होंने इस शहर को कला, संगीत और वास्तुकला का एक बेजोड़ केंद्र बनाया। यहाँ की हवाओं में आज भी उस दौर की खुशबू महसूस होती है, जब शाम-ए-अवध का अपना एक अलग ही रूतबा हुआ करता था।
वास्तुकला की दृष्टि से देखें तो लखनऊ की हर गली किसी कहानी की तरह खुलती है। बड़ा इमामबाड़ा की मशहूर भूलभुलैया और इसकी बिना स्तंभों वाली विशाल छत इंजीनियरिंग का एक अद्भुत नमूना है। छोटा इमामबाड़ा, रूमी दरवाजा और रेजीडेंसी जैसी इमारतें यहाँ के शाही अतीत की गवाही देती हैं। मुगलिया और तुर्की कला के मेल से बनी ये इमारतें पर्यटकों को मंत्रमुग्ध कर देती हैं। लखनऊ सिर्फ पत्थरों का शहर नहीं है, बल्कि यह साहित्य और कला की रूह भी है। कथक नृत्य की विधा हो या उर्दू शायरी और गजलें, इस शहर ने संस्कृति को सींचा है।
लखनऊ का जिक्र इसके जायकों के बिना अधूरा है। यहाँ का दस्तरख्वान पूरी दुनिया में अपनी लज्जत के लिए जाना जाता है। टुंडे कबाबी के मशहूर गलौटी कबाब हों या अवधी बिरयानी की खुशबू, यहाँ का खाना हर पेट के रास्ते दिल तक पहुँचता है। इसके अलावा यहाँ की 'चिकनकारी' (कढ़ाई) का काम विश्व प्रसिद्ध है, जो लखनऊ की कलात्मकता का प्रतीक है। आधुनिकता के इस दौर में भी लखनऊ ने अपनी प्राचीन गरिमा को बरकरार रखा है। यहाँ के लोग आज भी अपनी भाषा में 'जनाब' और 'शुक्रिया' जैसे शब्दों का इस्तेमाल कर नवाबी संस्कृति को जीवित रखे हुए हैं। वास्तव में, लखनऊ एक ऐसा अनुभव है जिसे शब्दों में नहीं, बल्कि वहाँ की गलियों में घूमकर महसूस किया जा सकता है।

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