फोन पर वीडियो देखने का नशा: कितना खतरनाक है?

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  सुबह आंख खुलते ही फोन पर वीडियो देखना, खाना खाते समय रील्स चलाना, खाली समय में लगातार शॉर्ट वीडियो स्क्रॉल करना और रात को सोने से पहले “बस एक वीडियो और” कहना—आज यह आदत बहुत सामान्य हो गई है। वीडियो देखना अपने आप में नुकसानदायक नहीं है। फोन से मनोरंजन के साथ-साथ पढ़ाई, समाचार और जानकारी भी मिलती है। समस्या तब शुरू होती है जब वीडियो देखने का समय हमारे नियंत्रण से बाहर होने लगे और जरूरी काम, नींद, पढ़ाई, नौकरी या परिवार के साथ बिताया समय पीछे छूटने लगे। यही वजह है कि फोन पर वीडियो देखने की आदत कब सामान्य मनोरंजन से आगे बढ़ जाती है और कब चिंता का कारण बन सकती है, इसे समझना जरूरी है। क्या फोन पर वीडियो देखना सच में “नशा” है? बोलचाल की भाषा में लोग किसी ऐसी आदत को “नशा” कह देते हैं जिसे छोड़ना मुश्किल महसूस हो। लेकिन हर व्यक्ति जो लंबे समय तक वीडियो देखता है, उसे चिकित्सकीय रूप से “आदी” कहना सही नहीं होगा। असल चिंता तब होती है जब व्यक्ति वीडियो देखने पर नियंत्रण नहीं रख पाता, दूसरी जरूरी गतिविधियों पर उसका असर पड़ने लगता है और नुकसान दिखाई देने के बावजूद वह अपनी आदत को कम नहीं कर पाता।...

लखनऊ नजाकत नफासत का संगम नवाबों का शहर



भारत के हृदय स्थल उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ सिर्फ एक शहर नहीं, बल्कि एक जीती-जागती विरासत है। इसे 'नवाबों का शहर' और 'पूर्व का स्वर्ण नगर' कहा जाता है। गोमती नदी के किनारे बसा यह शहर अपनी 'पहले आप' वाली तहजीब, अदब और नजाकत के लिए पूरी दुनिया में मशहूर है। लखनऊ का इतिहास नवाबों के शासनकाल से गहराई से जुड़ा है, जिन्होंने इस शहर को कला, संगीत और वास्तुकला का एक बेजोड़ केंद्र बनाया। यहाँ की हवाओं में आज भी उस दौर की खुशबू महसूस होती है, जब शाम-ए-अवध का अपना एक अलग ही रूतबा हुआ करता था।
वास्तुकला की दृष्टि से देखें तो लखनऊ की हर गली किसी कहानी की तरह खुलती है। बड़ा इमामबाड़ा की मशहूर भूलभुलैया और इसकी बिना स्तंभों वाली विशाल छत इंजीनियरिंग का एक अद्भुत नमूना है। छोटा इमामबाड़ा, रूमी दरवाजा और रेजीडेंसी जैसी इमारतें यहाँ के शाही अतीत की गवाही देती हैं। मुगलिया और तुर्की कला के मेल से बनी ये इमारतें पर्यटकों को मंत्रमुग्ध कर देती हैं। लखनऊ सिर्फ पत्थरों का शहर नहीं है, बल्कि यह साहित्य और कला की रूह भी है। कथक नृत्य की विधा हो या उर्दू शायरी और गजलें, इस शहर ने संस्कृति को सींचा है।
लखनऊ का जिक्र इसके जायकों के बिना अधूरा है। यहाँ का दस्तरख्वान पूरी दुनिया में अपनी लज्जत के लिए जाना जाता है। टुंडे कबाबी के मशहूर गलौटी कबाब हों या अवधी बिरयानी की खुशबू, यहाँ का खाना हर पेट के रास्ते दिल तक पहुँचता है। इसके अलावा यहाँ की 'चिकनकारी' (कढ़ाई) का काम विश्व प्रसिद्ध है, जो लखनऊ की कलात्मकता का प्रतीक है। आधुनिकता के इस दौर में भी लखनऊ ने अपनी प्राचीन गरिमा को बरकरार रखा है। यहाँ के लोग आज भी अपनी भाषा में 'जनाब' और 'शुक्रिया' जैसे शब्दों का इस्तेमाल कर नवाबी संस्कृति को जीवित रखे हुए हैं। वास्तव में, लखनऊ एक ऐसा अनुभव है जिसे शब्दों में नहीं, बल्कि वहाँ की गलियों में घूमकर महसूस किया जा सकता है।

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