ज़ायके का संगम: वो शहर जहाँ की सुबह कढ़ी कचौड़ी की खुशबू से होती है गुलज़ार
सिनेमा आज मनोरंजन का सबसे प्रभावशाली माध्यम बन चुका है, लेकिन इसकी शुरुआत उन्नीसवीं सदी के अंत में एक साधारण तकनीकी प्रयोग से हुई थी। इस ऐतिहासिक बदलाव के पीछे फ्रांस के आविष्कारक लुई लुमिएर और उनके भाई ऑगस्ट लुमिएर का महत्वपूर्ण योगदान रहा। उन्होंने ऐसी मशीन बनाई जिसने चलती हुई तस्वीरों को दुनिया के सामने प्रस्तुत किया।
लुई लुमिएर ने सिनेमैटोग्राफ नामक एक विशेष मशीन डिज़ाइन की। इस मशीन में फिल्म के किनारों पर छोटे-छोटे पिन होल्स बनाए गए थे, जिनकी मदद से फिल्म को नियंत्रित तरीके से आगे बढ़ाया जाता था। सिनेमैटोग्राफ प्रति सेकंड 16 फ्रेम कैप्चर और प्रोजेक्ट करने में सक्षम था, जो उस समय एक बड़ी तकनीकी उपलब्धि मानी जाती थी।
इस मशीन की सबसे खास बात इसका इंटरमिटेंट मूवमेंट था, यानी फिल्म का रुक-रुक कर चलना। यह प्रणाली लुई लुमिएर ने एक सिलाई मशीन के मैकेनिज़्म से प्रेरित होकर विकसित की थी। इसी तकनीक के कारण हर फ्रेम साफ दिखाई देता था और तस्वीरें जीवंत लगती थीं।
सिनेमैटोग्राफ का पेटेंट फरवरी 1895 में कराया गया। इसके ठीक अगले महीने लुई और ऑगस्ट लुमिएर ने इसी मशीन से अपनी पहली फिल्म बनाई। इस फिल्म में लुमिएर फैक्ट्री के मजदूरों को काम खत्म होने के बाद बाहर निकलते हुए दिखाया गया था। यह फिल्म इतिहास में “वर्कर्स लीविंग द लुमिएर फैक्ट्री” के नाम से जानी जाती है।
हालाँकि यह फिल्म बहुत छोटी और साधारण थी, लेकिन इसे दुनिया की पहली मोशन पिक्चर फिल्मों में से एक माना जाता है।
सिनेमैटोग्राफ ने फिल्म बनाने और दिखाने की प्रक्रिया को आसान बना दिया। यही आविष्कार आगे चलकर आधुनिक फिल्म उद्योग की नींव बना। लुई लुमिएर की यह खोज केवल एक तकनीकी सफलता नहीं थी, बल्कि इसने कहानी कहने और मनोरंजन की दुनिया को हमेशा के लिए बदल दिया।
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