ज़ायके का संगम: वो शहर जहाँ की सुबह कढ़ी कचौड़ी की खुशबू से होती है गुलज़ार

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  भारतीय खान-पान की दुनिया में कचौड़ी का नाम आते ही मन में एक करारा और तीखा स्वाद घुल जाता है, लेकिन जब इसी खस्ता कचौड़ी के ऊपर गरमा-गरम चटपटी कढ़ी डाली जाती है, तो वह स्वाद एक नया ही अनुभव बन जाता है। भारत के कई शहरों में कढ़ी-कचौड़ी केवल एक नाश्ता नहीं बल्कि वहाँ की जीवनशैली और संस्कृति का अहम हिस्सा है। राजस्थान का ajmer    शहर इस मामले में सबसे आगे है, जहाँ के केसरगंज और गोल प्याऊ जैसे इलाकों में सुबह होते ही कढ़ी-कचौड़ी की खुशबू हर गली में महकने लगती है। यहाँ की खास बात यह है कि दाल की कचौड़ी को मथकर उसके ऊपर बेसन की पतली और मसालेदार कढ़ी डाली जाती है, जो सेलिब्रिटीज से लेकर आम आदमी तक सबको दीवाना बना देती है। राजस्थान का ही एक और ज़िला bhartpur  अपनी छोटी कचौड़ियों के लिए 'सिटी ऑफ कचौड़ी' के नाम से विख्यात है। यहाँ कढ़ी के साथ छोटी-छोटी कुरकुरी कचौड़ियाँ परोसी जाती हैं, जो बाहरी पर्यटकों के लिए भी एक बड़ा आकर्षण हैं। इसके अलावाjalor  में दही और कढ़ी के साथ कचौड़ी का कॉम्बो काफी लोकप्रिय है। मध्य प्रदेश केindore  औरjallor जैसे शहरों में ...

प्रकृति की गोद में 'डिस्को डांसर': ऊटी की वादियों और मिथुन चक्रवर्ती का अनूठा रिश्ता

 


सिनेमा की चकाचौंध और मुंबई की भागदौड़ भरी जिंदगी से दूर, जब हम शांति और सुकून की तलाश करते हैं, तो नीलगिरी की पहाड़ियों में बसा ऊटी जेहन में आता है। लेकिन ऊटी का जिक्र बॉलीवुड के दिग्गज अभिनेता मिथुन चक्रवर्ती के बिना अधूरा है। 'मिथुन दा' के लिए यह महज एक हिल स्टेशन नहीं, बल्कि उनकी आत्मा का एक हिस्सा है। सत्तर और अस्सी के दशक में अपनी शानदार अदाकारी और डांस से पूरी दुनिया को दीवाना बनाने वाले मिथुन दा ने करियर के एक पड़ाव पर ऊटी की शांत वादियों को अपना ठिकाना बनाया। यहाँ की मखमली हरियाली, ऊँचे देवदार के वृक्ष और धुंध की चादर ओढ़े पहाड़ों के बीच उन्होंने न केवल अपना आशियाना बनाया, बल्कि 'मोनार्क ग्रुप ऑफ होटल्स' के जरिए एक व्यावसायिक साम्राज्य भी खड़ा किया।

कहा जाता है कि मिथुन चक्रवर्ती के लिए ऊटी बेहद भाग्यशाली रहा है; उनकी वहाँ शूट हुई लगभग हर फिल्म बॉक्स ऑफिस पर सफल रही। इसी जुड़ाव ने उन्हें प्रकृति के और करीब ला दिया। आज भी जब वे अपने होटल 'द मोनार्क' की बालकनी से ऊटी की ढलानों को देखते हैं, तो उनकी आँखों में वही चमक होती है जो प्रकृति के किसी प्रेमी की होती है। वे एक ऐसे अभिनेता हैं जो अपने बगीचों, पेड़-पौधों और दर्जनों पालतू कुत्तों के बीच अपनी असली खुशी ढूंढते हैं। ऊटी की ताजी हवा और वहां का शांत वातावरण उन्हें वह सादगी प्रदान करता है, जो आज के शोर-शराबे वाले दौर में दुर्लभ है। मिथुन दा का ऊटी में होना यह साबित करता है कि सफलता के शिखर पर पहुँचने के बाद भी इंसान की असल शांति कुदरत के आगोश में ही छिपी है। पहाड़ों की यह खामोशी और प्रकृति का यह बेमिसाल सौंदर्य ही है जो इस 'ग्रैंड मास्टर' को आज भी तरोताजा और ऊर्जावान बनाए रखता है।

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