फोन पर वीडियो देखने का नशा: कितना खतरनाक है?

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  सुबह आंख खुलते ही फोन पर वीडियो देखना, खाना खाते समय रील्स चलाना, खाली समय में लगातार शॉर्ट वीडियो स्क्रॉल करना और रात को सोने से पहले “बस एक वीडियो और” कहना—आज यह आदत बहुत सामान्य हो गई है। वीडियो देखना अपने आप में नुकसानदायक नहीं है। फोन से मनोरंजन के साथ-साथ पढ़ाई, समाचार और जानकारी भी मिलती है। समस्या तब शुरू होती है जब वीडियो देखने का समय हमारे नियंत्रण से बाहर होने लगे और जरूरी काम, नींद, पढ़ाई, नौकरी या परिवार के साथ बिताया समय पीछे छूटने लगे। यही वजह है कि फोन पर वीडियो देखने की आदत कब सामान्य मनोरंजन से आगे बढ़ जाती है और कब चिंता का कारण बन सकती है, इसे समझना जरूरी है। क्या फोन पर वीडियो देखना सच में “नशा” है? बोलचाल की भाषा में लोग किसी ऐसी आदत को “नशा” कह देते हैं जिसे छोड़ना मुश्किल महसूस हो। लेकिन हर व्यक्ति जो लंबे समय तक वीडियो देखता है, उसे चिकित्सकीय रूप से “आदी” कहना सही नहीं होगा। असल चिंता तब होती है जब व्यक्ति वीडियो देखने पर नियंत्रण नहीं रख पाता, दूसरी जरूरी गतिविधियों पर उसका असर पड़ने लगता है और नुकसान दिखाई देने के बावजूद वह अपनी आदत को कम नहीं कर पाता।...

सड़क किनारे ढाबों वाला भारत

 

भारत केवल एक देश नहीं, बल्कि अनुभवों का संसार है। यहाँ की आत्मा गलियों, चौपालों और सड़कों के किनारे लगे छोटे-छोटे ढाबों और खाने के डिब्बों में बसती है। सड़क किनारे ढाबों में खाना केवल भूख मिटाने का साधन नहीं, बल्कि असली भारत को महसूस करने का तरीका है।

सुबह-सुबह चाय के ढाबे पर खड़े लोग, अख़बार की सुर्खियों पर चर्चा करते हुए गरम चाय की चुस्की लेते हैं। कहीं समोसे और कचौड़ियाँ तली जा रही होती हैं, तो कहीं पराठों की खुशबू दूर से ही बुला लेती है। दोपहर या शाम होते-होते दाल फ्राई और तंदूर की गरम-गरम चपातियों की खुशबू माहौल को और खास बना देती है। कम दाम में मिलने वाली यह सादी-सी थाली स्वाद और संतोष से भर देती है।

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पंजाब के मशहूर अमरीक सुखदेव ढाबा (मुरथल), हरियाणा का गुलशन ढाबा, दिल्ली का करिम्स ढाबा, राजस्थान की सड़कों पर मिलने वाला श्याम ढाबा, या फिर उत्तर प्रदेश और बिहार के हाइवे पर बसे छोटे-छोटे देसी ढाबे हर जगह दाल फ्राई और तंदूर की चपाती का स्वाद अलग लेकिन यादगार होता है। इन ढाबों की लकड़ी की बेंच, बड़े तवे और मिट्टी की खुशबू खाने को और भी खास बना देती है।

इन ढाबों पर न कोई दिखावा होता है और न ही महँगे मेन्यू यहाँ स्वाद, अपनापन और सादगी ही सबसे बड़ी पहचान है। सड़क किनारे खाना खाने का सबसे बड़ा आकर्षण है वहाँ का अपनापन। अजनबी लोग भी कुछ ही पलों में बातचीत में जुड़ जाते हैं। दुकानदार ग्राहक को नाम से नहीं, मुस्कान से पहचानता है। दाल फ्राई की एक कटोरी और तंदूर की चपाती के साथ मिलने वाला प्यार किसी भी बड़े होटल से बढ़कर होता है।

ये ढाबे भारत की विविधता को भी दर्शाते हैं। कहीं मुंबई का वड़ा पाव, कहीं दिल्ली की चाट, कहीं दक्षिण भारत का इडली-डोसा, तो कहीं बिहार का लिट्टी-चोखा। अलग-अलग स्वाद, लेकिन एक ही भावना सबको साथ बैठाकर खिलाने की।

आज भले ही बड़े रेस्तराँ और कैफ़े बढ़ गए हों, लेकिन सड़क किनारे ढाबों का महत्व कभी कम नहीं होगा। क्योंकि असली भारत चमकती इमारतों में नहीं, बल्कि धूल भरी सड़कों पर बसे उन ढाबों में मिलता है, जहाँ दाल फ्राई और तंदूर की चपाती जैसे साधारण पकवान भी असाधारण लगते हैं।

सच कहा जाए, तो सड़क किनारे ढाबों में खाना ही असली भारत का अनुभव है।


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