ज़ायके का संगम: वो शहर जहाँ की सुबह कढ़ी कचौड़ी की खुशबू से होती है गुलज़ार
भारत में खाना सिर्फ पेट भरने का ज़रिया नहीं है, बल्कि हमारी रोज़मर्रा की ज़िंदगी और भावनाओं से जुड़ा हुआ विषय है। घर का बना सादा खाना हमेशा से सेहत और संतुलन का प्रतीक रहा है। लेकिन तेज़ होती ज़िंदगी, नौकरी का दबाव और अकेले रहने की मजबूरी के चलते अब बहुत से लोगों के लिए रोज़ घर का खाना बनाना संभव नहीं रह गया है। इसी वजह से घर जैसा टिफिन खाना मंगाने का चलन तेजी से बढ़ा है।
आज मेट्रो शहरों से लेकर छोटे शहरों तक लोग होटल या फास्ट फूड की बजाय टिफिन सेवाओं को प्राथमिकता दे रहे हैं। ढाबा स्टाइल लोकल टिफिन सेवाएँ, FoodCloud, Homefoodi, Masala Box, Yummy Tiffins और कई शहरों में सक्रिय Zomato के “होम-स्टाइल मील्स” जैसे विकल्प लोगों को घर जैसा सादा खाना उपलब्ध करा रहे हैं। इन सेवाओं में दाल-चावल, रोटी-सब्ज़ी और हल्का भोजन होता है, जो रोज़ खाया जा सके।
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इस बदलाव के पीछे स्वास्थ्य को लेकर बढ़ती समझ भी एक बड़ा कारण है। बाहर के खाने में तेल और मसाले ज़्यादा होते हैं, जबकि टिफिन सर्विस में खाना अपेक्षाकृत हल्का और संतुलित होता है। छात्र, ऑफिस जाने वाले युवा, अकेले रहने वाले कर्मचारी और बुज़ुर्ग सभी के लिए यह एक सुरक्षित और भरोसेमंद विकल्प बन चुका है।
खास बात यह है कि इस बढ़ते चलन ने रोज़गार के नए रास्ते भी खोले हैं। कई महिलाएँ और छोटे उद्यमी अपने घर से ही टिफिन सेवा शुरू कर रहे हैं। व्हाट्सऐप, कॉल और लोकल ऐप्स के ज़रिये ऑर्डर लेकर वे रोज़ सैकड़ों लोगों को खाना पहुँचा रहे हैं। इससे न सिर्फ लोगों को घर जैसा खाना मिल रहा है, बल्कि कई परिवारों की आमदनी भी बढ़ रही है।
कुल मिलाकर, भारत में घर जैसा टिफिन खाना अब सिर्फ एक सुविधा नहीं, बल्कि एक ज़रूरत बनता जा रहा है। आधुनिक जीवनशैली के बीच यह चलन हमारी पारंपरिक भोजन संस्कृति को बचाए रखने में मदद कर रहा है। सच यही है कि घर जैसा खाना जहाँ भी मिले, वही सबसे अच्छा लगता है।
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