जमीं पर बैठकर भोजन: परंपरा, स्वास्थ्य और परिवार का मेल

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भारत में भोजन केवल पेट भरने का साधन नहीं रहा, बल्कि यह संस्कृति, परंपरा और सामाजिक आदतों का भी हिस्सा रहा है। वर्षों पहले तक हमारे देश में खाना हमेशा जमीं पर बैठकर ही खाया जाता था। परिवार और रिश्तेदार इकट्ठा होकर फर्श पर बैठते, थाली हाथ में पकड़कर भोजन करते और खाने का समय न केवल स्वादिष्ट बल्कि सामूहिक आनंद का भी समय होता था। लेकिन आज की तेज़-तर्रार जिंदगी ने इस प्रथा को लगभग समाप्त कर दिया है। आधुनिक घरों में डाइनिंग टेबल और कुर्सियों ने जमीं पर बैठकर खाने की जगह ले ली है। अब परिवार के सदस्य अलग-अलग कमरों में फोन या टीवी के सामने बैठकर खाना खाते हैं। इस बदलाव के कई कारण हैं। एक तो जीवनशैली का तेज़ होना, दूसरा आधुनिक सुविधाओं का आना, और तीसरा शहरी जीवन की भीड़भाड़ और समय की कमी। पारंपरिक जमीं पर बैठकर खाने की प्रथा न केवल भोजन को आनंदमय बनाती थी, बल्कि इससे शारीरिक स्वास्थ्य पर भी सकारात्मक प्रभाव पड़ता था। जमीन पर बैठकर खाने से पाचन क्रिया बेहतर होती थी, मुद्रा में सुधार आता था और भोजन का हर निवाला धीरे-धीरे चबाया जाता था। इसके अलावा, यह परंपरा परिवारिक सामूहिकता और संवाद को बढ़ाती थी...

बीकानेर का अंतरराष्ट्रीय ऊंट उत्सव 2026 मरुधरा की धड़कन

 


इन सबका अद्भुत संगम है बीकानेर का अंतरराष्ट्रीय ऊंट उत्सव, जो इस वर्ष 9 से 11 जनवरी 2026 तक पूरे शौर्य और सांस्कृतिक वैभव के साथ आयोजित हो रहा है।
📍 पहला दिन | 9 जनवरी –
उत्सव की शुरुआत हुई ऐतिहासिक हेरिटेज वॉक से, जहाँ बीकानेर की गलियों ने अपनी विरासत खुद बयां की। हुई मिस मरवन मिस्टर बीकानेर प्रतियोगिता, 25 किलो वजन की पगड़ी,40 फीट लंबी मूछें,, बीकानेरी व्यंजनों का स्वाद,
शाम को हुए सांस्कृतिक कार्यक्रम तो मानो मरु संस्कृति का जीवंत मंच बन गया।
इस तस्वीर में दिख रहा अग्नि-नृत्य और लोक कलाकारों का समर्पण यह बताने के लिए काफी है कि बीकानेर सिर्फ शहर नहीं, एक अनुभव है।
📍 दूसरा दिन | 10 जनवरी –
योग,राष्ट्रीय उष्ट्र अनुसंधान केंद्र में
यह दिन पूरी तरह ऊंटों के नाम रहेगा—
🐪 ऊंट सजावट प्रतियोगिता, फर कटिंग
🐪 ऊंट दौड़, घुड़ दौड़
🐪 ऊंटों से जुड़ी पारंपरिक कलाएं
करणी सिंह स्टेडियम में ऊंटों के इतिहास की प्रदर्शनी, फोक नाइट,
जोड़बीड़ में बर्ड फेस्टिवल
सादुल क्लब ग्राउंड में पेरा मोटरिंग
जहाँ देशी ही नहीं, विदेशी पर्यटक भी इस अनोखी विरासत को करीब से देख पाएंगे।
📍 तीसरा दिन | 11 जनवरी – रायसर
रेगिस्तान की खुली धरती पर देशी–विदेशी मेहमानों की रोमांचक प्रतियोगिताएं,
लोक संस्कृति की झलक और बीकानेर की मेहमाननवाज़ी का शिखर देखने को मिलेगा। ग्रामीण खेलो मे केमल सफारी,सेंड आर्ट, देशी विदेशी कलाकारों की प्रस्तुतियां, अग्नि नृत्य,
👉 जो लोग इस साल किसी कारण से नहीं आ पाए, वे एक बात गांठ बाँध लें—
अगले साल बीकानेर का ऊंट उत्सव मिस करना मतलब राजस्थान की आत्मा को अधूरा देखना।
🐪💛 बीकानेर आपको बुला रहा है…
संस्कृति, रंग, रेत और ऊंटों की दुनिया में खो जाने के लिए। अगले साल जनवरी 2027 के हो जाइए तैयार।

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