जमीं पर बैठकर भोजन: परंपरा, स्वास्थ्य और परिवार का मेल

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भारत में भोजन केवल पेट भरने का साधन नहीं रहा, बल्कि यह संस्कृति, परंपरा और सामाजिक आदतों का भी हिस्सा रहा है। वर्षों पहले तक हमारे देश में खाना हमेशा जमीं पर बैठकर ही खाया जाता था। परिवार और रिश्तेदार इकट्ठा होकर फर्श पर बैठते, थाली हाथ में पकड़कर भोजन करते और खाने का समय न केवल स्वादिष्ट बल्कि सामूहिक आनंद का भी समय होता था। लेकिन आज की तेज़-तर्रार जिंदगी ने इस प्रथा को लगभग समाप्त कर दिया है। आधुनिक घरों में डाइनिंग टेबल और कुर्सियों ने जमीं पर बैठकर खाने की जगह ले ली है। अब परिवार के सदस्य अलग-अलग कमरों में फोन या टीवी के सामने बैठकर खाना खाते हैं। इस बदलाव के कई कारण हैं। एक तो जीवनशैली का तेज़ होना, दूसरा आधुनिक सुविधाओं का आना, और तीसरा शहरी जीवन की भीड़भाड़ और समय की कमी। पारंपरिक जमीं पर बैठकर खाने की प्रथा न केवल भोजन को आनंदमय बनाती थी, बल्कि इससे शारीरिक स्वास्थ्य पर भी सकारात्मक प्रभाव पड़ता था। जमीन पर बैठकर खाने से पाचन क्रिया बेहतर होती थी, मुद्रा में सुधार आता था और भोजन का हर निवाला धीरे-धीरे चबाया जाता था। इसके अलावा, यह परंपरा परिवारिक सामूहिकता और संवाद को बढ़ाती थी...

चीन के ग्वांगझोउ में भारतीय शाकाहार की खुशबू: शर्मा जी की ऐतिहासिक यात्रा

 

जब कोई भारतीय स्वाद विदेश की धरती पर अपनी जड़ें जमा लेता है, तो वह केवल एक रेस्टोरेंट नहीं रहता, बल्कि वह यादों, संस्कृति और अपनत्व का ठिकाना बन जाता है। चीन के व्यस्त और आधुनिक महानगर ग्वांगझोउ में स्थित SHARMAJI ऐसा ही एक नाम है, जिसने वर्ष 1999 में एक ऐतिहासिक पहल करते हुए ग्वांगझोउ का पहला पूर्णतः शुद्ध शाकाहारी भारतीय रेस्टोरेंट शुरू किया।

उन्नीस सौ निन्यानवे का वह दौर ग्वांगझोउ के लिए तेज़ बदलावों का समय था। अंतरराष्ट्रीय व्यापार अपने पांव पसार रहा था और बड़ी संख्या में भारतीय व्यापारी, उद्योगपति और पेशेवर इस शहर की ओर रुख कर रहे थे। लेकिन विदेशी माहौल में एक बड़ी कमी साफ़ महसूस होती थी,घर जैसा शुद्ध भारतीय शाकाहारी भोजन। इसी कमी ने शर्माजी के जन्म की कहानी लिखी।

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एक ऐसे देश में, जहाँ भोजन की परंपराएँ बिल्कुल अलग हैं, वहाँ शुद्ध शाकाहारी भारतीय रसोई स्थापित करना आसान नहीं था। फिर भी शर्माजी ने शुरुआत से ही अपने सिद्धांतों को मजबूती से थामे रखा। यहाँ भोजन केवल स्वाद के लिए नहीं, बल्कि विश्वास और संस्कार के साथ परोसा गया। यही कारण था कि यह रेस्टोरेंट देखते ही देखते भारतीयों के बीच भरोसे का नाम बन गया।

शर्माजी का खाना लोगों को सिर्फ तृप्त नहीं करता था, वह भावनाओं को भी छूता था। थाली में परोसी गई दाल, सब्ज़ी और रोटियों में भारत की मिट्टी की खुशबू बसती थी। ग्वांगझोउ की तेज़ रफ्तार ज़िंदगी के बीच यह जगह लोगों को कुछ पल ठहरने और अपनेपन का एहसास दिलाती थी। यहाँ बैठकर खाना खाते हुए कई लोगों को अपने शहर, अपने घर और माँ की रसोई की याद आ जाती थी।

धीरे-धीरे शर्माजी केवल भोजन का ठिकाना नहीं रहा। यह भारतीय समुदाय के मेल-मिलाप का केंद्र बन गया। नए आए भारतीयों के लिए यह जगह एक परिचय बनती थी, जहाँ न सिर्फ खाना मिलता था बल्कि अपनापन और मार्गदर्शन भी। भारतीय त्योहारों पर यहाँ का माहौल खास हो जाता था, जब दीपावली की रोशनी और होली के रंग विदेशी ज़मीन पर भी भारत की मौजूदगी का एहसास कराते थे।

1999 में शुरू हुई यह यात्रा समय के साथ ग्वांगझोउ में भारतीय पहचान का हिस्सा बन गई। जब शहर में कई अंतरराष्ट्रीय रेस्टोरेंट खुल चुके हैं, तब भी शर्माजी  को उसके पहले कदम और अटूट सिद्धांतों के लिए विशेष सम्मान के साथ याद किया जाता है। यह रेस्टोरेंट आज भी इस बात का प्रमाण है कि स्वाद और संस्कृति सीमाओं में नहीं बंधते।

शर्माजी  की कहानी हमें यह सिखाती है कि जब कोई पहल दिल से शुरू होती है, तो वह सिर्फ व्यापार नहीं रहती, बल्कि इतिहास बन जाती है। ग्वांगझोउ की धरती पर भारतीय शाकाहार की यह खुशबू आज भी उस साहसिक शुरुआत की याद दिलाती है, जो 1999 में की गई थी।

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