ज़ायके का संगम: वो शहर जहाँ की सुबह कढ़ी कचौड़ी की खुशबू से होती है गुलज़ार

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  भारतीय खान-पान की दुनिया में कचौड़ी का नाम आते ही मन में एक करारा और तीखा स्वाद घुल जाता है, लेकिन जब इसी खस्ता कचौड़ी के ऊपर गरमा-गरम चटपटी कढ़ी डाली जाती है, तो वह स्वाद एक नया ही अनुभव बन जाता है। भारत के कई शहरों में कढ़ी-कचौड़ी केवल एक नाश्ता नहीं बल्कि वहाँ की जीवनशैली और संस्कृति का अहम हिस्सा है। राजस्थान का ajmer    शहर इस मामले में सबसे आगे है, जहाँ के केसरगंज और गोल प्याऊ जैसे इलाकों में सुबह होते ही कढ़ी-कचौड़ी की खुशबू हर गली में महकने लगती है। यहाँ की खास बात यह है कि दाल की कचौड़ी को मथकर उसके ऊपर बेसन की पतली और मसालेदार कढ़ी डाली जाती है, जो सेलिब्रिटीज से लेकर आम आदमी तक सबको दीवाना बना देती है। राजस्थान का ही एक और ज़िला bhartpur  अपनी छोटी कचौड़ियों के लिए 'सिटी ऑफ कचौड़ी' के नाम से विख्यात है। यहाँ कढ़ी के साथ छोटी-छोटी कुरकुरी कचौड़ियाँ परोसी जाती हैं, जो बाहरी पर्यटकों के लिए भी एक बड़ा आकर्षण हैं। इसके अलावाjalor  में दही और कढ़ी के साथ कचौड़ी का कॉम्बो काफी लोकप्रिय है। मध्य प्रदेश केindore  औरjallor जैसे शहरों में ...

चीन के ग्वांगझोउ में भारतीय शाकाहार की खुशबू: शर्मा जी की ऐतिहासिक यात्रा

 

जब कोई भारतीय स्वाद विदेश की धरती पर अपनी जड़ें जमा लेता है, तो वह केवल एक रेस्टोरेंट नहीं रहता, बल्कि वह यादों, संस्कृति और अपनत्व का ठिकाना बन जाता है। चीन के व्यस्त और आधुनिक महानगर ग्वांगझोउ में स्थित SHARMAJI ऐसा ही एक नाम है, जिसने वर्ष 1999 में एक ऐतिहासिक पहल करते हुए ग्वांगझोउ का पहला पूर्णतः शुद्ध शाकाहारी भारतीय रेस्टोरेंट शुरू किया।

उन्नीस सौ निन्यानवे का वह दौर ग्वांगझोउ के लिए तेज़ बदलावों का समय था। अंतरराष्ट्रीय व्यापार अपने पांव पसार रहा था और बड़ी संख्या में भारतीय व्यापारी, उद्योगपति और पेशेवर इस शहर की ओर रुख कर रहे थे। लेकिन विदेशी माहौल में एक बड़ी कमी साफ़ महसूस होती थी,घर जैसा शुद्ध भारतीय शाकाहारी भोजन। इसी कमी ने शर्माजी के जन्म की कहानी लिखी।

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एक ऐसे देश में, जहाँ भोजन की परंपराएँ बिल्कुल अलग हैं, वहाँ शुद्ध शाकाहारी भारतीय रसोई स्थापित करना आसान नहीं था। फिर भी शर्माजी ने शुरुआत से ही अपने सिद्धांतों को मजबूती से थामे रखा। यहाँ भोजन केवल स्वाद के लिए नहीं, बल्कि विश्वास और संस्कार के साथ परोसा गया। यही कारण था कि यह रेस्टोरेंट देखते ही देखते भारतीयों के बीच भरोसे का नाम बन गया।

शर्माजी का खाना लोगों को सिर्फ तृप्त नहीं करता था, वह भावनाओं को भी छूता था। थाली में परोसी गई दाल, सब्ज़ी और रोटियों में भारत की मिट्टी की खुशबू बसती थी। ग्वांगझोउ की तेज़ रफ्तार ज़िंदगी के बीच यह जगह लोगों को कुछ पल ठहरने और अपनेपन का एहसास दिलाती थी। यहाँ बैठकर खाना खाते हुए कई लोगों को अपने शहर, अपने घर और माँ की रसोई की याद आ जाती थी।

धीरे-धीरे शर्माजी केवल भोजन का ठिकाना नहीं रहा। यह भारतीय समुदाय के मेल-मिलाप का केंद्र बन गया। नए आए भारतीयों के लिए यह जगह एक परिचय बनती थी, जहाँ न सिर्फ खाना मिलता था बल्कि अपनापन और मार्गदर्शन भी। भारतीय त्योहारों पर यहाँ का माहौल खास हो जाता था, जब दीपावली की रोशनी और होली के रंग विदेशी ज़मीन पर भी भारत की मौजूदगी का एहसास कराते थे।

1999 में शुरू हुई यह यात्रा समय के साथ ग्वांगझोउ में भारतीय पहचान का हिस्सा बन गई। जब शहर में कई अंतरराष्ट्रीय रेस्टोरेंट खुल चुके हैं, तब भी शर्माजी  को उसके पहले कदम और अटूट सिद्धांतों के लिए विशेष सम्मान के साथ याद किया जाता है। यह रेस्टोरेंट आज भी इस बात का प्रमाण है कि स्वाद और संस्कृति सीमाओं में नहीं बंधते।

शर्माजी  की कहानी हमें यह सिखाती है कि जब कोई पहल दिल से शुरू होती है, तो वह सिर्फ व्यापार नहीं रहती, बल्कि इतिहास बन जाती है। ग्वांगझोउ की धरती पर भारतीय शाकाहार की यह खुशबू आज भी उस साहसिक शुरुआत की याद दिलाती है, जो 1999 में की गई थी।

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