ज़ायके का संगम: वो शहर जहाँ की सुबह कढ़ी कचौड़ी की खुशबू से होती है गुलज़ार
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| jaipur hand block printing history |
राजपूत शासकों के काल में हाथ से छपे वस्त्रों को विशेष महत्व प्राप्त हुआ। ये कपड़े केवल पहनावे तक सीमित नहीं थे, बल्कि महलों की सजावट, पूजा-पाठ और राजकीय उपहारों का भी अहम हिस्सा थे। लगभग तीन सौ वर्ष पहले शुरू हुई यह परंपरा धीरे-धीरे जयपुर की पहचान बन गई और कारीगरों के पूरे समुदाय इसी कला के इर्द-गिर्द विकसित होने लगे।
मुगल प्रभाव के साथ जयपुर की हैंड ब्लॉक प्रिंटिंग में बारीकी और सौंदर्य का नया स्तर जुड़ा। फारसी शैली से प्रेरित फूलों, बेलों और संतुलित पैटर्न ने स्थानीय लोक डिज़ाइनों के साथ मिलकर एक अनोखी शैली को जन्म दिया। इस दौर में सांगानेर और बगरू जैसे क्षेत्र विकसित हुए, जहाँ यह कला पीढ़ी दर पीढ़ी सिखाई जाने लगी। लगभग तीन से चार सौ साल पहले स्थापित ये केंद्र आज भी उसी ऐतिहासिक परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं।
उस समय जयपुर के हाथ से छपे कपड़े केवल स्थानीय बाज़ारों तक सीमित नहीं थे। ऐतिहासिक व्यापार मार्गों के ज़रिये ये वस्त्र मध्य एशिया, अरब देशों और यूरोप तक पहुँचते थे। इनकी मांग उनके टिकाऊपन, प्राकृतिक रंगों और हाथ की बनी विशिष्ट छपाई के कारण थी। यह अंतरराष्ट्रीय व्यापार भी लगभग तीन सौ वर्ष पहले ही शुरू हो चुका था, जिसने जयपुर को एक महत्वपूर्ण वस्त्र केंद्र के रूप में स्थापित किया।
ब्रिटिश काल और औद्योगिक युग में मशीन से बने कपड़ों का दबाव बढ़ा, फिर भी सैकड़ों वर्षों पुरानी यह कला समाप्त नहीं हुई। लगभग तीन सौ साल पहले शुरू हुई यह परंपरा कारीगर परिवारों की ज़िद, धैर्य और सांस्कृतिक जुड़ाव के कारण जीवित रही। स्वतंत्रता के बाद इसे फिर से पहचान मिली और आज यह न केवल एक ऐतिहासिक धरोहर है, बल्कि आधुनिक फैशन और सस्टेनेबल जीवनशैली का भी हिस्सा बन चुकी है।
इस तरह जयपुर की हैंड ब्लॉक प्रिंटिंग, जिसकी शुरुआत लगभग तीन से साढ़े तीन सौ वर्ष पहले हुई थी, आज भी उतनी ही जीवंत है। यह कला समय के साथ बदली जरूर है, लेकिन इसकी आत्मा आज भी उन्हीं हाथों में बसती है, जिन्होंने सदियों पहले रंगों और कपड़ों के माध्यम से इतिहास रचना शुरू किया था।
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