ज़ायके का संगम: वो शहर जहाँ की सुबह कढ़ी कचौड़ी की खुशबू से होती है गुलज़ार

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  भारतीय खान-पान की दुनिया में कचौड़ी का नाम आते ही मन में एक करारा और तीखा स्वाद घुल जाता है, लेकिन जब इसी खस्ता कचौड़ी के ऊपर गरमा-गरम चटपटी कढ़ी डाली जाती है, तो वह स्वाद एक नया ही अनुभव बन जाता है। भारत के कई शहरों में कढ़ी-कचौड़ी केवल एक नाश्ता नहीं बल्कि वहाँ की जीवनशैली और संस्कृति का अहम हिस्सा है। राजस्थान का ajmer    शहर इस मामले में सबसे आगे है, जहाँ के केसरगंज और गोल प्याऊ जैसे इलाकों में सुबह होते ही कढ़ी-कचौड़ी की खुशबू हर गली में महकने लगती है। यहाँ की खास बात यह है कि दाल की कचौड़ी को मथकर उसके ऊपर बेसन की पतली और मसालेदार कढ़ी डाली जाती है, जो सेलिब्रिटीज से लेकर आम आदमी तक सबको दीवाना बना देती है। राजस्थान का ही एक और ज़िला bhartpur  अपनी छोटी कचौड़ियों के लिए 'सिटी ऑफ कचौड़ी' के नाम से विख्यात है। यहाँ कढ़ी के साथ छोटी-छोटी कुरकुरी कचौड़ियाँ परोसी जाती हैं, जो बाहरी पर्यटकों के लिए भी एक बड़ा आकर्षण हैं। इसके अलावाjalor  में दही और कढ़ी के साथ कचौड़ी का कॉम्बो काफी लोकप्रिय है। मध्य प्रदेश केindore  औरjallor जैसे शहरों में ...

हैंड ब्लॉक प्रिंटिंग की शुरुआत लगभग 300 साल पहले हुई थी जयपुर में

 

jaipur hand block printing history
जयपुर में हैंड ब्लॉक प्रिंटिंग का इतिहास केवल एक शिल्प की कहानी नहीं है, बल्कि यह राजस्थान की सांस्कृतिक पहचान, व्यापारिक परंपराओं और कारीगरों की पीढ़ियों से चली आ रही मेहनत का जीवंत प्रमाण है। इतिहासकारों और वस्त्र शोधकर्ताओं के अनुसार जयपुर क्षेत्र में हैंड ब्लॉक प्रिंटिंग की व्यवस्थित शुरुआत लगभग सत्रहवीं शताब्दी के अंत में मानी जाती है, यानी आज से करीब तीन सौ से साढ़े तीन सौ वर्ष पहले। उसी समय आमेर और बाद में स्थापित हुए जयपुर राज्य ने इस कला को संरक्षण देना शुरू किया।

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राजपूत शासकों के काल में हाथ से छपे वस्त्रों को विशेष महत्व प्राप्त हुआ। ये कपड़े केवल पहनावे तक सीमित नहीं थे, बल्कि महलों की सजावट, पूजा-पाठ और राजकीय उपहारों का भी अहम हिस्सा थे। लगभग तीन सौ वर्ष पहले शुरू हुई यह परंपरा धीरे-धीरे जयपुर की पहचान बन गई और कारीगरों के पूरे समुदाय इसी कला के इर्द-गिर्द विकसित होने लगे।

मुगल प्रभाव के साथ जयपुर की हैंड ब्लॉक प्रिंटिंग में बारीकी और सौंदर्य का नया स्तर जुड़ा। फारसी शैली से प्रेरित फूलों, बेलों और संतुलित पैटर्न ने स्थानीय लोक डिज़ाइनों के साथ मिलकर एक अनोखी शैली को जन्म दिया। इस दौर में सांगानेर और बगरू जैसे क्षेत्र विकसित हुए, जहाँ यह कला पीढ़ी दर पीढ़ी सिखाई जाने लगी। लगभग तीन से चार सौ साल पहले स्थापित ये केंद्र आज भी उसी ऐतिहासिक परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं।

उस समय जयपुर के हाथ से छपे कपड़े केवल स्थानीय बाज़ारों तक सीमित नहीं थे। ऐतिहासिक व्यापार मार्गों के ज़रिये ये वस्त्र मध्य एशिया, अरब देशों और यूरोप तक पहुँचते थे। इनकी मांग उनके टिकाऊपन, प्राकृतिक रंगों और हाथ की बनी विशिष्ट छपाई के कारण थी। यह अंतरराष्ट्रीय व्यापार भी लगभग तीन सौ वर्ष पहले ही शुरू हो चुका था, जिसने जयपुर को एक महत्वपूर्ण वस्त्र केंद्र के रूप में स्थापित किया।

ब्रिटिश काल और औद्योगिक युग में मशीन से बने कपड़ों का दबाव बढ़ा, फिर भी सैकड़ों वर्षों पुरानी यह कला समाप्त नहीं हुई। लगभग तीन सौ साल पहले शुरू हुई यह परंपरा कारीगर परिवारों की ज़िद, धैर्य और सांस्कृतिक जुड़ाव के कारण जीवित रही। स्वतंत्रता के बाद इसे फिर से पहचान मिली और आज यह न केवल एक ऐतिहासिक धरोहर है, बल्कि आधुनिक फैशन और सस्टेनेबल जीवनशैली का भी हिस्सा बन चुकी है।

इस तरह जयपुर की हैंड ब्लॉक प्रिंटिंग, जिसकी शुरुआत लगभग तीन से साढ़े तीन सौ वर्ष पहले हुई थी, आज भी उतनी ही जीवंत है। यह कला समय के साथ बदली जरूर है, लेकिन इसकी आत्मा आज भी उन्हीं हाथों में बसती है, जिन्होंने सदियों पहले रंगों और कपड़ों के माध्यम से इतिहास रचना शुरू किया था।

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