गोंधल क्या है? मराठी परंपरा से ऑस्कर तक

चित्र
  Gondhal Oscar 2027: मराठी फिल्म ‘गोंधल’ के भारत की आधिकारिक ऑस्कर एंट्री बनने के बाद महाराष्ट्र की एक पारंपरिक लोक-विधि भी चर्चा में आ गई है। आखिर गोंधल क्या है और इस परंपरा का फिल्म से क्या संबंध है? आइए समझते हैं। गोंधल आखिर होता क्या है? महाराष्ट्र में गोंधल एक पारंपरिक धार्मिक अनुष्ठान और लोक-प्रस्तुति है, जिसमें भक्ति, संगीत, गायन और नृत्य का मेल देखने को मिलता है। यह परंपरा कुछ परिवारों में कुलदेवता की पूजा और शुभ अवसरों से जुड़ी रही है। महाराष्ट्र के मराठी विश्वकोश के अनुसार, गोंधल देवी की स्तुति और पूजा से जुड़ा एक कुलाचार है। गोंधल की प्रस्तुति करने वाले कलाकारों को गोंधली कहा जाता है। पारंपरिक प्रस्तुति में देवी-देवताओं की स्तुति, लोकगीत, वाद्य संगीत और नृत्य शामिल होते हैं। शादी जैसे शुभ अवसरों पर भी होती है यह परंपरा गोंधल का संबंध महाराष्ट्र के कुछ परिवारों में विवाह और दूसरे मंगल अवसरों से रहा है। महाराष्ट्र सरकार के गजेटियर में भी इसका उल्लेख मिलता है कि शुभ अवसर के बाद देवी की पूजा और स्तुति के लिए गोंधल की प्रस्तुति की जाती थी। इस दौरान रात में संगीत और नृत्य ...

सांची स्तूप जहाँ पत्थर बोलते हैं और इतिहास मुस्कुराता है


 भोपाल की चहल-पहल से 56 किलोमीटर उत्तर-पश्चिम दिशा में स्थित साँची स्तूप, ऐतिहासिक वास्तुकला का एक मंत्रमुग्ध कर देने वाला दृश्य है। वर्ष 1989 से यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल के रूप में मान्यता प्राप्त यह पवित्र परिसर भगवान बुद्ध और उनके अनुयायियों के पवित्र अवशेषों को संजोए हुए है। यह स्थल बौद्ध कला और स्थापत्य का बेजोड़ प्रतीक है। साँची की भव्यता केवल इसकी स्थापत्य सुंदरता में नहीं, बल्कि इसमें रचे-बसे आध्यात्मिक अर्थों में भी समाई हुई है।

 यहाँ की बारीक नक्काशीदार द्वारों पर बुद्ध के जीवन की दिव्य कथाएँ और बौद्ध जातक कथाओं में छिपे गहन उपदेश उकेरे गए हैं। स्तूपों को सुशोभित करते हैं भव्य तोरण द्वार, जो समरसता, श्रद्धा और वीरता के प्रतीक हैं। ये तोरण न केवल स्थापत्य की दृष्टि से अद्वितीय हैं, बल्कि पूरे वातावरण में एक गहन आध्यात्मिक आभा भी घोल देते हैं। 


साँची स्तूप की कहानी तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व से शुरू होती है, जब दूरदर्शी मौर्य सम्राट अशोक ने इसके निर्माण का आदेश दिया। युद्ध की विभीषिका के बाद बौद्ध धर्म की ओर उनके झुकाव का यह प्रतीक, गहन आध्यात्मिक आस्था की अमिट मिसाल बनकर उभरा।

 समय के साथ एक साधारण ईंटों की संरचना से विकसित होकर साँची एक अद्वितीय कला-रचना में परिवर्तित हो गया। सतवाहन, गुप्त और कुषाण जैसे शासकों ने भी इस धरोहर में अपनी छाप छोड़ी  पत्थर की परतें, बारीक नक्काशी से सजी रेलिंग्स और लुभावने तोरण द्वार जोड़कर उन्होंने इसकी सुंदरता को और भी निखार दिया। साँची स्तूप, प्राचीन भारत की विलक्षण शिल्पकला और आध्यात्मिक विरासत का एक जीता-जागता प्रमाण है, 

सांची स्तूप को रुचि का पुनरुत्थान मिला जब सर अलेक्जेंडर कनिंघम ने 19 वीं शताब्दी के पुरातात्विक अभियान के दौरान इसके अवशेषों की खोज की। अथक उत्खनन और जीर्णोद्धार के प्रयासों के माध्यम से, यह अब विश्व स्तर पर आगंतुकों को चुंबकित करता है, उन्हें अपनी प्राचीन दीवारों के भीतर आध्यात्मिक ऊर्जा का अनुभव करने के लिए आकर्षित करता है। 

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

उत्तराखंड की विश्व प्रसिद्ध चारधाम यात्रा के लिए ऑनलाइन पंजीकरण आज से शुरू

दुनिया की पहली फोटो की कहानी

प्रतापगढ़ विलेज थीम रिज़ॉर्ट Haryana — शहर के शोर से दूर देहात की सुकून भरी झलक

कौसानी की चोटी से एक सुबह सूर्योदय ज़रूर देखें ,यह पल सचमुच जादुई है

चौखी धानी: जयपुर में संस्कृति, कला और देहात की आत्मा को भी अपने साथ समेटे हुए है