गोंधल क्या है? मराठी परंपरा से ऑस्कर तक

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  Gondhal Oscar 2027: मराठी फिल्म ‘गोंधल’ के भारत की आधिकारिक ऑस्कर एंट्री बनने के बाद महाराष्ट्र की एक पारंपरिक लोक-विधि भी चर्चा में आ गई है। आखिर गोंधल क्या है और इस परंपरा का फिल्म से क्या संबंध है? आइए समझते हैं। गोंधल आखिर होता क्या है? महाराष्ट्र में गोंधल एक पारंपरिक धार्मिक अनुष्ठान और लोक-प्रस्तुति है, जिसमें भक्ति, संगीत, गायन और नृत्य का मेल देखने को मिलता है। यह परंपरा कुछ परिवारों में कुलदेवता की पूजा और शुभ अवसरों से जुड़ी रही है। महाराष्ट्र के मराठी विश्वकोश के अनुसार, गोंधल देवी की स्तुति और पूजा से जुड़ा एक कुलाचार है। गोंधल की प्रस्तुति करने वाले कलाकारों को गोंधली कहा जाता है। पारंपरिक प्रस्तुति में देवी-देवताओं की स्तुति, लोकगीत, वाद्य संगीत और नृत्य शामिल होते हैं। शादी जैसे शुभ अवसरों पर भी होती है यह परंपरा गोंधल का संबंध महाराष्ट्र के कुछ परिवारों में विवाह और दूसरे मंगल अवसरों से रहा है। महाराष्ट्र सरकार के गजेटियर में भी इसका उल्लेख मिलता है कि शुभ अवसर के बाद देवी की पूजा और स्तुति के लिए गोंधल की प्रस्तुति की जाती थी। इस दौरान रात में संगीत और नृत्य ...

मूगा रेशम परंपरा दो हज़ार वर्षों से भी अधिक पुरानी

 

भारत की प्रसिद्ध मूगा रेशम साड़ी के इतिहास को जानने आइए, जो असम राज्य की सांस्कृतिक और आर्थिक विरासत से गहराई से जुड़ा हुआ है। अपनी अद्भुत चमक और प्राकृतिक सुनहरी आभा के लिए प्रसिद्ध मूगा रेशम सदियों से एक अनमोल और सम्मानित वस्त्र रहा है, जो असम की पहचान और शिल्प परंपरा को दर्शाता है। 

भारत जैसे देश में अनेक पारंपरिक कला और शिल्प की तरह ही मूगा रेशम के उत्पादन की सटीक उत्पत्ति स्पष्ट नहीं है। हालांकि, मूगा रेशम के उत्पादन और उपयोग का उल्लेख चौथी से तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व के बीच दार्शनिक एवं राजकीय सलाहकार कौटिल्य द्वारा किए गए ग्रंथों में मिलता है—अर्थात् यह परंपरा दो हज़ार वर्षों से भी अधिक पुरानी है।मूगा रेशम को वैभव और विशिष्टता का दर्जा असम के आहोम वंश के शासनकाल में, 13वीं शताब्दी के दौरान प्राप्त हुआ। वीं  शताब्दी में मिला। यह मुख्य रूप से राजपरिवार उच्च अधिक पठन-पाठन और कुलीन वर्ग के लिए आरक्षित था। 

अहोम शासकों के प्रोत्साहन और संरक्षण ने मूगा रेशम उद्योग को नई दिशा दी, जिससे असम में मूगा रेशम की कताई और बुनाई एक घरेलू और अनिवार्य पेशा बन गई। परंपरागत रूप से, मूगा रेशम की बुनाई एक परिवार आधारित व्यवसाय रही है, जिसे पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ाया जाता रहा।आज भी इसकी निर्माण प्रक्रिया में कई सूक्ष्म और हस्तनिर्मित चरण शामिल हैं, जिनके लिए प्रशिक्षित और कुशल कारीगरों की आवश्यकता होती है। यही कारण है कि मूगा रेशम आज भी अपनी विशिष्टता, गुणवत्ता और पारंपरिक मूल्य को बनाए हुए है। 

मूगा रेशम केवल एक वस्त्र नहीं, बल्कि असमिया संस्कृति की पहचान है। मूगा रेशम की साड़ी को पहनने से जुड़ी विशिष्टता और गरिमा के कारण, इसकी भव्य कढ़ाईदार आकृतियाँ और विशिष्ट सुनहरी आभा असम के त्योहारों और विवाह समारोहों का एक अविभाज्य हिस्सा बन चुकी हैं। यह परिधान परंपरा, प्रतिष्ठा और सांस्कृतिक गौरव का सुंदर प्रतीक है। 

समृद्ध संस्कृति और विरासत के पारखियों के लिए, मुगा रेशम की साड़ी को ओढ़ने का अनुभव लेना नितांत आवश्यक है , यह न केवल वस्त्र है, बल्कि एक परंपरा को आत्मसात करने का भाव है। 


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